दुनिया मे सिर्फ दो जात– या तो अमीर या गरीब !
हम जाती का रोना रोते हैं
राजनेता इसे भुनाते हैं
क्षेत्रीय राजनीति दो दशक से
कुछ ज्यादा ही परवान चढ़ी है
ओर इसलिए देश मे कुछ समय
हां त्रिशंकु सरकारें बनी हैं
राज्य स्तर पर जातिगत समीकरण
हां हर समय रंग बताते हैं
कांग्रेस शुरू से ही राष्ट्रीय दल
उसे 65 साल बाद मिला सशक्त विपक्ष
इतना कि आस्तित्व ही है दाव पर
विपक्ष के प्रमुख दल के लिए जरूरी
50 सीट्स भी नही महज़ 47 पर सिमटना
ओर देश के राष्ट्रीय दल का यू मजाक बनना
कांग्रेस जिसने मतदाता समीकरण घड़े
दलित प्लस माइनर प्लस एक दो जाती
ओर हमेशा जीत जाती
फिर उधर शाही इमाम से गठजोड़
ओर जामा मस्जिद से शाही फरमान
कम पढ़ में जबरदस्त एकता होती है
बेचारे वो अच्छा-बुरा सियासत कहा समझती है
लेकिन अब जमाना बदला है
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सजग बना सयाना है
वो किसी फतवे का किसी ऐलान का गुलाम नही रहा है
शिक्षा ,दूरदर्शन ओर सोशल मीडिया क्रांति ने
हाँ उसे स्मार्ट या बहुत तेजतर्रार किया है
ओर मेरा सूक्ष्म आंकलन जाति पर
या तो कोई गरीब है या फिर अमीर
दुनिया मे बस यही दो प्रमुख जात है
या फिर जिसकी लाठी उसकी भैस
याके ताकतवर या के कमझोर की जमात है
थोड़ा और बढ़े तो पढ़-अपढ़ की बात है
ओर आगे बढ़े बुद्धिजीवी ओर सामान्य बुद्धि
क्यो क्यो की शिक्षा या डिग्री श्रेष्ठ बुद्धि का मापन कहा
‘प्यासा कौआ’ कहानी पढ़े विष्णु शर्मा की
या इसप की ‘फसल अब जरूर कटेगी’
अपढ़ निर्दोष पशुओं में बुध्दि प्रखर होती है।
इसलिए “सनातन” कहते दुनिया मे दीगर दो ही जात
हो पैसा धन रुतबा तो क्या कोई पूछे
ओ रामविलास हो तुम पासवान या तेजस्विजी माया जी
है क्या आपकी जात-पात
बस धन ही असली जात धन के आगे सब शून्य सिफ़र
धन ही दुनिया जी बड़ी जात।
*N K सेवक “सनातन”
नोट: मैं विषय प्रधान “अकविता कविता”
अपनी शैली में लिखता हूं।