चलो आज फिर असभ्य बन जाए -2
” चलो आज फिर असभ्य बन जाए -2
सभ्यता क्या है असभ्यता क्या है ?
बस अपनी अपनी सोच
अपनी दृष्टी का आईना है
सभ्यता कपडे पहनना ही होती
तो महेश्वर आदमी को सोचो
सोचो क्या नंगा ही पैदा करता.!
शायद नही जहा हर तत्व में
हां सूक्ष बुध्धि अपनाई है
क्या वो महा शक्ति ऐसी भूल
सोचो कर सकता है
इसलिए आदमी कहता है
हर आदमी कपड़ो में नंगा है
समाज के आइनों में हमने
हाँ पर्दा लगाया ओढा है
जो रस्म पवित्र है
जो दुनिया को बढ़ाती
हां और बरकरार रखती है
क्या गर वो अपवित्र होती-2
तो क्या वो सर्व शक्तिमान
बस यही तरिका क्यों अपनाता
हर आदमी की इक ही ओकात है
खाना कपडे भाषा शरिर ठीक है
सुबह और ख़ास देनिक प्रक्रिया में
अह आदमी की इक सी ओकात है
वहा क्या आमिर क्या गरीब
कुछ भी खाओ पीओ
सबका इक सा परिणाम है
वहा धनिक वर्ग का बस चले तो-2
तो बदल दे ये स्वरुप
मगर नश्वर आदमी-2
अह! हर जगह विवश
और अफ़सोस निरा प्राण है ।
nk सनातन