“गांधी के देश में गांधी का मखोल!”
“गांधी का मखोल”
गाँधी भारत ही नही सन्सार की एतिहासिक हस्तियों में एक
महानं कर्मशील आध्यात्मिक नेतिक सिधान्तो में बड़ा नेक
क्रांतिकारी स्वतन्त्रता सेनानी राजनेता संत लेखक समाज सुधारक
और बिखरे टूटे गुलाम सहमे भारत को इक जूट बने उद्धारक
आन्दोलन के ज्वार में झोक उद्धत प्रेरित कर
स्वतंत्रता के कर्णधार बने पीढ़ी में छा कर
और राष्ट्र नेताओं ने राष्ट्र को प्रजातंत्र में पिरोया
और गांधी को महानायक मान देश को सिंचोया
जिसने बुध्धिमान कुटनीतिक अंग्रेजो को हिंसक हथियार से नही
वरन वाह अचरज -मात्र अहिंसा के नायाब हथियार से जीता
आश्चर्य -लोग योद्धा जो काम बन्दुक गोलों से न कर सके
बिना हिंसा के ये कमाल गांधी के कंधो से निबटे
और तब देश ने इक् सूत्रीय लोकतंत्र राज्य का
हां तब निर्विवाद राष्ट्र पिता माना नवाज़ा
गांधी अफ्रिका गए जो देश था नीग्रो का
लेकिन वहा शासन अंग्रेजो का था
भारत अपना भी उन्ही का गुलाम था
वहा क्रूर अमानवीय मगर एतिहासिक घटना घटी
वो भी गांधी तब साधारण – क्या बर्बरता उनके साथ पटी
हां असाधारण इतिहास गढ़ने क्रूरता से गुजरी
वहाँ गाँधी को ए क्लास रेल डिब्बे से धकेल दिया जाता है
क्यों क्योकि आपका रंग गोरा नही था उतार दिया जाता है
यह कह कर की-यु इन्डियन काला आदमी
और कडवे घुट पी गांधी को पिटा जाता है
इस अमानवीय घटना ने गाँधी को अंदर से हिला दिया
और गुजरात के गांधी में हिन्दुस्ता का तब घिनोना हाल गुंजा
इंग्लैंड में बेरिस्टरी की डिग्री ली तब कुछ न खला
तब हिन्दुस्ता गुलाम अंग्रेजो का न ख्याल पला
लेकिन गुलाम राज की वकिली डिग्री से
आहत गांधी को अफ्रिका का अनुभव चुभा
और अब तक था मात्र वकील कडवे अनुभव से उबला
तब उदारवादी गोपाल गोखले का दामन थामा
राजनेतिक गुरु मान कूच स्वतन्त्रा आन्दोलन में किया
छोड़ी वकालत लगे हाथो कूद पडा वो भुगत भोगी
ठान लेता हैं वो दूर दासता करने को
फिरंगियो से अपने ही ढंग से लड़ने
की बौद्ध-महावीर के हथियार को अपना कर
आदर्श राम राज्य की स्थापन की धुन संजो कर
आज भारत सम्पूर्ण संप्रभु गणराज्य
“सनातन नरेश “का सवाल की क्या
क्या वाकई लोकतंत्र हैं भारत में
हैं वाकई समानता देश भारत में
अफ़सोस कहा है है तो सिर्फ मताधिकार में
बाकि कई महकमो में है घोर असमानता
हां विशेष भारत के लोगो की यात्रा की धडकन
यानी की छुक छुक कलरव करती भारतीय रेल
फिर देखे होटल जहा भी फर्स्ट सेकंड थर्ड क्लास
क्यों भाई बस थिएटर और अन्य जगह
“सनातन” की दिली पुकार -सभी सार्वजानिक क्षेत्रो में
हां प्रथम द्वितीय तृतीय दर्जा हो ही नही
जहा गरीबी अमीरी दोयम दर्ज़ा और असमानता झलकती है
तब गरीब शब्द मिट जाय हिन् भावना पट जाए
हाँ कम से कम सार्वजनिक राजकीय प्रकुती व्यवहारों में
हाँ व्यक्तिगत कार में घुमे घर में रहे चाहे जितनी शानो शोकत लिए
मगर पार्क बगीचे सार्वजानिक चबूतरे भवन किले
जहा अमीर गरीब समान समान ही बेठे
तो अरोप्ले न मे न हो कोई बात नही
वो अमीरों रसुखो की बपोती
वहा नही ना सही लेकिन रेल
जो गरीबो की ही क्यों गरीब के साथ रहती पेल
हां सिर्फ इक ही दर्ज़ा हो कोई आरक्षण नही
सिर्फ साधारण दर्ज़ा ठीक सार्वजनिक पार्क की तरह
ठीक राजकीय बसों में जेसे कोई दर्ज़ा नही
कोई आरक्षण नही जहा जिसे जगह मिले
हां सामान बिना भेद भाव बेठे
ऐसा कर महान गांधी जिसे कोसा गया अफ्रिका में
और उस विचार से जो नायक बना
उसी के देश में क्यों बरकरार असमान ढर्रा
जिनकी थ्योरी सिधांत से नेल्सन मंडेला ने
क्या ग़जब इतिहास रचा और उनकी
गहन सोच से अमरीका में गणतंत्र गहराया
संकीर्णता से उपर उठ पहली बार
अश्वेत रास्ट्रपति चुना जो इतिहास में बराक ओबामा कहलाया।।
nk सनातन