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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

“तुलना और तर्क”

“तर्क और तुलना”
दुनिया के दो सब से जहीन और महीन और दिल्चश्प और दिलकश विषय-वस्तु हैं-तर्क और तुलना । इन दोनों को लोगों द्वारा बेहद पसंद किया जाता है। सर्वप्रथम मै तर्क पर अपने विचार रखता हूँ की तर्क में तीन तरह के सुर -असुर वो कुतर्क -वितर्क और सटीक तर्क , इसके उप प्रकारों में उतरे तो व्यक्तिगत तर्क, सर्वग्राह्य तर्क सर्व मान्य या सर्वसम्मत तर्क। लेकिन तर्क इक ऐसी विधा जिसका अंत नही और है जो असहमति और असंतोष पर ही ख़त्म होता है। किसी को संतुष्ट करना दुष्कर कार्य है। किसी निष्कर्ष पर पूरी मान्यता के साथ पहुचना बहुत मुश्किल या असंभव कहे तो भी गलत नही। क्योकि इसमे आपका धर्म आपका नाप आपका संताप आपकी सोच आपकी असोच आपके संशय आपके अहंम आपकी पराकाष्ठा आपका ज्ञान -विज्ञान आपका अनुभव् आपकी अपनी शिक्षा आपका देश आपका समाज आपका साहचर्य और अंतत विश्व और वैश्विक परिवेश और सबसे ऊपर भय स्वार्थ और इन सब परिप्रेक्ष्यो में तर्क भटक जाते है और सर्व सम्मति असंभव । हालाकि मन बेमन निष्कर्ष पर पहुचते है बहुमत के आधार पर। हम सब तर्कों के साथ न्याय नही कर पाते हैं क्योकिं हम सब किसी निजी राष्ट्र या जन्मभूमि से बंधे जुड़े होते हैं फिर राज्य फिर zone फिर जिला फिर क़स्बा फिर गाँव फिर धाणी फिर मोहल्ला और अंतिम घर परिवार। इन सब प्रभागो विभागों में विभाजित हैं हम बंटे हुवे हैं हम और इससे ऊपर अपनी झकड़ी हुई और आरोपित मानसिकता से बंधे हुवे हैं । तिस पर इक परम सत्य परम निष्कर्ष के लिए आप हम सब को इन मूल्यों बिन्दुओ क्षेत्रो से ऊपर उठना पडेगा।
मै जब भी तर्क करता हूँ तो मेरी सोच सार्वभोमिक या वैश्विक सोच के घेरे में या इर्द गिर्द होते हैं जिसमे इक ही आह की -सारा विश्व इक परिवार हो जिसमे सोहार्द्र हो । वेसे परिवार इक भी लड़ते हैं कुछ कारको को लेकर जेसे जर ज़ोरू और धन जिसमे विवाहोत्तर और पूर्वोत्तर आपसी मत भेद उत्त्पन्न होते हैं लेकिन इक आशा की जासकती है की इका रह सकता है। पैतृक संम्पत्ति दो भाइयो व् बहनों में बड़ा कारण रहा है आपसी विवादों का। दो भाइयो का आपसी पैतृक संपत्ति विवाद न हो दो बहुओ का मतेक्य न हो भाई सन्तति में स्नेह हो सास ससुर के प्रति सामंजस्य हो बहुओ के साथ ये सब तारतम्यता परस्परता यदि स्थायी है तो इक परिवार में सुख शान्ति बनी रह सकती है वरना इक परिवार की कल्पना फ़िज़ूल निरर्थक और शुन्य है। लेकिन परिवार शांति की साधारण रूप से इक पराकाष्ठा है और यदि आपसी समझ बुज़ तालमेल विवेक है तो शांति सुख स्थापित हो सकते हैं।
खेर मै बात कर रहा हूं तर्क की , तर्क के लिए जरुरी है की व्यक्ति अपने सभी पूर्वाग्रहो सोचो मानसिकताओ को परे रखे अलग रखे और विशेष रूप से काल मार्क्स ने धर्म को अफीम की गोली बताया कहा जिससे कोई अछुता नही है । धर्म धर्म नही लाता नेतिकता नही लाता सोहार्द्र प्रेम भाईचारा नही लाता वो ज्वार तूफ़ान विध्वंस विनाश आरोहित करता है सिधांत में ठीक लेकिन व्यवहार में व्यक्ति अधर्मी है और सिर्फ धर्म का चोंगा पहन रखा है स्वांग रचा रखा है। क्योकिं क्योकि कोई भि अपने आप को धर्म से ऊपर उठाना नही चाहता । आपको सर्व सम्मत तर्क करने हैं तो खुद को धर्म से अलग करना होगा और अपने आप को व्यक्तिगत धर्म से ऊपर उठ कर मानवीय धर्म को तरजीह देनी होगी।
कबीर महान और क्रांतिकारी संत हुवे वो न हिन्दू हुवे न मुसल्मा तब इसाई धर्म से उनका परिचय नही हुवा था ने साफगोई से दोनों धर्मो को बुराइयों को बड़ी बेबाकी से इंगित किया और खंडन किया । उस समय सुल्तान का शासन लेकिन कोई फतवा कोई एलान नही हुबा जबकि हिन्दू तब भी बहुल था। क्योकि उन्होंने कडवा नेतिक सत्य कहा था।। थोडा बहुत विरोध असंतोष हूवा धर्म पर रोटी सकने वालो का लेकिन वो नगण्य था । हम सबके पास समृद्ध उन्नत धर्म लेकिन अधर्म पर चलने का लाइसेंस देते और सिर्फ सिधान्तो आडम्बरो पाखंडो में व्यवहार में हम नितांत अधर्मी मोकापरस्त स्वार्थी जो उस महा शक्ति को भी जुठला देते हैं। अब मै हिन्दू हूं यदि बहस में मै भगवान् श्री राम की आलोचना की उनका पत्नी त्याग और बाली वध तो में धर्मनिरपेक्ष और अन्य धर्म के लोगो मे मेरी इज्जत कद बढ़ जाएगा। लेकिन मेरे धर्म के अतिवादी या कट्टरपंथीयो की त्योरियां चढ़ जायेंगी और मुझे विधर्मी कहां जाएगा।
ठीक इस तरह कोई इस्लाम का बंदा उसके धर्म की बुराई कर दे जेसे की इरफ़ान खान मशहूर बॉलीवुड -हॉलीवुड फिल्म नायक ने को यह कह कर की इक जंगल में पाले बकरे को मै खरीद कर कुर्बानी दू तो मुझे केसे जन्नत मिल जाएगी जबकि पैगम्बर ने अपना पुत्र प्रस्तुत किया था इबादत की परम पराकाष्ठा में। ये प्रतिक्रया जो सत्य वदन है ऒर अतिवादी इसे नही पचा पाते और बो इसे नाजाय ठहराते कहते हैं
ईश निंदा। ठीक इसी तरह जेन बंधू उनके दिग्म्बर होने की आलोचना कर दे तो अधर्मी। कोई जेन मतावलंबी ये कह दे की सभ्यता संस्कृती के इस दौर में आपका नंगत्व अजेन या अन्य समुदायों पे दर्शाना महज़ धर्म के नाम तो ये ठीक नही नंगत्व हल नही त्याग शरीर कष्ट कोई हल नही आप कष्ट सहते हैं समाज समक्ष आदर्श जताने और दूसरी तरफ आपका अनुयायी समाज अत्याधुनिक एश्वर्य आपके लिए जुटाता हैं कीमती सिंघासन या ड्योढीयाँ सजाता हैं। और आप इसका विरोध नही करते और बचाव में कह देते हैं की मै नही कहता समाज व्यवस्था करता है तो भई आप साफ़ इनकार करे सरल जीवन है तो बहिष्कार करे लेकिन नही वहा आपका चरित्र दोहरा या दो रंगी है। महावीर जिसने सारे वैभव त्यागे उनको महावीर स्वामी तीर्थ पर रत्नों से सजाया जाता है महंगी अंगिया कर शुशोभित किया जाता है और धार्मिक आयोजनों में स्वामीवात्सल के नाम 56 भोग बनाए जाते हैं क्या आपके और उस महामानव के आदर्शो और त्याग का अपमान नही !!ठीक इसी भांति इसाई धर्म में उद्दत इश्वारिय तथ्य जो पत्थर की लकीर थे को चुनोती देते हुवे कोपर्निकस गेलिलेओ डार्विन और फिर विज्ञान के चमत्कारों ने जुठ्लाया जबकि प्रथमत उन्हें विद्रोह मान सजा या दण्डित किया लेकिन कालातीत सत्य सबके सामने हैं। धरती जो हेर्कुलस द्वारा उठाए हुवे है वाही सनातन पुराणो में धरती शेष नाग पर टिकी है और जब वो हिलते हैं भूकंप आते हैं। कुछ शतियो पूर्व सूरज चन्दा नक्षत्र इश्वर माने जाते थे आज उनका सच सामने हैं अतः परिवर्तन स्वीकार करना कोई दुष्कर कार्य नही। यदि हम स्वच्छ और निर्मल मना स्वीकारे तो कई विवाद स्वत ही शून्य हो जाते हैं जेसे– राम जन्म भूमि –बाबरी मस्जिद विवाद
यअदी दोनों पक्ष राजनीति से परे सत्य के निकट जावे तो ये धार्मिक उन्माद निरर्थक हो जाते है जब इक मुस्लिम कहे की हां बाबर 1300 इसवी में भारत आक्रमण हेतु आया इतिहास इसका साक्षी और उसमे निश्चित कुछ मंदिर तोड़े तो बाबरी मस्जिद उसमे इक है बनालो मंदिर क्योकि कुरानुसार किसी भी विवादित जमी पर इबादत गाह नही निर्मित कइ जा सकती। ठीक इस तरह हिन्दू कट्टरपंथी तबका संकीर्णता छोड़ कहे की सारा भारत राम की जन्म भूमि मंदिर कही भी बनाले।
और यदि भगवान् राम के आदर्श और उनकी उत्तम मर्यादा को माने तो क्या वो कहते की हां मन्दिर यही बनेगा नही कदापि नही।
धर्म जिसे हम शाश्वत मानने का भ्रम पाले हूवे हैं और ग्रंथो को उस महा शक्ति द्वारा जताए और लिखे बताते हैं तो तो उस महामहिम की शक्ति से लिखे ग्रन्थ अजर अमर अमिट मूल रूप में सदेव उपस्तिथ और विद्यमान होने चाहिए जबकि ऐसा नही हैं लेकिन ये प्रश्न करना भी गले नही उतरती अति परम्परावादियो के। जब ये धर्म ग्रंथ उस परम अलोकिक दिव्य शक्ति द्वारा उकेरित हैं तो इक ही प्रति क्यों लाखो क्यों नही और वो भी मूल रूप में अब भी उपलब्ध होना चाहिए था। लेकिन इस पर अतिवादी लोग भ्रमित बयांन दे गुमराह करते हैं। सारी धार्मिक पुस्तके मानव रचित जिसमे दो शास्त्र इक उस महा सत्ता का दूसरा धर्म गुरुओ द्वारा रचा हुवा जो स्वांग आडम्बर और पाखंडो से व्याप्त स्वार्थो से प्रायोजित है।
दुनिया नश्वर है यहाँ कोई शास्वत नही सिवाय मृत्यु के क्योकि शास्वत धर्म होता तो नए धर्म इक के बाद इक प्रकट हो अस्तित्व में नही आते। सभी धर्मो में समय समय पर सुधार हुवे हैं समाज को परिष्कृत करने। धर्म के ठेकेदार नही चाहते की सुधार आवे क्योकि ये कुरीतिया समाप्त हो गयी तो वो धन केसे बना पायेंगे अपना महत्व बनाए रखने हेतु वो चाहते हैं की अंध आस्था बनी रहे । हिन्दू वैदिक सनातन धर्म में ब्राह्मणवाद और उच्चकुलीन वाद बहुत हावी रहा जिससे इक साधारण व्यक्ति धर्म के मर्म स अछूता रहा और धर्म को बहुत नुक्सान हुवा और उस प्रतिकिया में जेसे ही नविन धर्म प्रकाश में आये उन लोगो ने उसकी शरण ली। लेकिन फिर भी वैदिक धर्म जो उदारवादी तरल और लचीला रहा है कई बिषम परिवर्तन स्वीकार किये हैं।
समाज इक व्यवस्था का नाम है जबकि धर्म इक नेतिक निति गत आचरण । समाज उन्ही धर्म के चरण अपनाकर सिधान्तो को आत्मसात कर सुनियोजित ढंग से चलता है । लेकिन धर्म पर और समाज काका कुछ ख़ास लोगो का प्रभाव पकड़ होती h जो धर्म और समाज दोनों को
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोप रूप विकृत करते हैं आडम्बर स्वांग रचते हुवे। साधारण लोगो में इतनी समझ सामर्थ्य नही होता की वो उनसे लोहा ले उनसे विद्रॊह करे । हम असल में उन लोगो के इरादों मंशुबो को भापे और वास्तविक रूप से धर्म का मर्म समझे और सुधारवादी प्रक्रिया को समय के साथ अपनाए कट्टरता को तिलांजली दे और सोहार्द्रमय वातावरण स्थापित करे। तर्कों में तर्कस के सारे तीर निकले भेदे और सह्रदयता से इसे स्वीकारे।
दूसरी बात तुलना इक दुष्कर और विरल कार्य जिससे न्याय करना मुश्किल। क्योकि उसमे वातावरण देश काळ समय परिवेश आदि कारक बड़ी महत्ती भूमिका अदा करते हैं।
मेरी दलील का निचोड़ की तर्क इक विचारो का आदान प्रदान है प्राचीन युगों में विद्वानों के बिच शास्त्रार्थ हूवा करते थे जिसमे विद्वान अपनी विद्वता दर्शा इक दुसरे का सम्मान करते थे। अंत में उस महान विचार वाल्टेयर के बिचार की हो सकता है मै आपके विचारो से सहमत होउ या नही लेकिन आपके विचार प्रकट करने की भावना और अधिकार की रक्षा करूँगा।
nk सनातन

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