“धन ही धरती असली देव”
**धन ही धरती का असली देव**
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धन की चाह सबकी की आह
हो धन तो करे सब वाह वाह
धन एब सारे के सारे मिटाए
धनाभाव तो सब नाथा बुलाये
धन आते ही नाथालाल बाजे
धन समाज के ये रस्म सुहाए
धन से ही गुण-अवगुण छाते
धन से कुछ भरमाते अग़ाते
धन से कुछ बन भी जाते
समाज में देविक अलख जगाते
दीप दान से पुन्य नाम कमाते
विपन्नो में दिल घर पूजे जाते
सम्पन्न और सरकारे भी नवाजे
दानी भी तब दो तरहो के जाने
इक तो प्रशस्ति के लिए ही जागे
कुछ गुप्तदानऔर कुछ न जताए
समाजसेवा ही जो कर्म धर्म बनाए
संम्पति को जो तुच्छ मान मान बढाये
उस माया में रम दूसरो में रमाये
योगी हो या भोगी चाहे ग्यानी यति
ये माया अजीब इससे कोई न बचा
धनार्जन को देखो बाबा ने स्वांग रचा
धन सबोकी कमजोरी और सीनाजोरी
धन इक पाश है इसी से रंग रास है
धन सब रिश्तो की आन जान प्राण है
***स्वरचित
nk सनातन
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Nk सनातन