भगवान परशुराम महागुरु आयुधाचार्य
**”अभय ,शुभम, अक्षय तृतीया पर “सनातन” परशुराम पाति”**
(भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जी की पावन -अलखमय जयंती पर मेरा रचनामयी भाव गुंथन)
विप्रवर दीर्घ अवतारम ,महामानव, दिव्य परशुरामम
अक्षय तृतीया, सुधा अवतरम, नमामि पावन पदम
माते रेणुका -महामुने जमदग्नि युगल परम् अलौकिक वंश सुतं
अपने दिव्य ज्ञान -युद्ध विज्ञान आप महा योद्धा करम
मातु पितु आज्ञाकारी ,महा माते, मातृ स्नेहधारी
भगवान परशुराम- दुष्ट, लोभी,अनाचारी सहस्त्रबाहु (सहस्त्रार्जुन)विनाशी
पाप मुक्त ,भय मुक्त वसुधा तारी
हाथ परशु ,कांधे धनुष, दिव्यास्त्रों के त्रिपुरारी
महागुरू प्रचंड- तेजोमय, दिव्यमाया, कायाधारी
तप,यज्ञ ,ज्ञान में लीन हे शिव अनुगामी
आप महायोद्धा ,महागुरु परम् ज्ञान विज्ञानी
महा गांगेय देवव्रत, महा कर्ण कान्तेय शिष्य महा रागी महा चरितधारी
अटल- ठानी ,प्रणधारी ,दिव्यास्त्र अनुरागी पाप हारी दलन -दमन विधानी
श्रेष्ट गुरु, महा साधक, शिव आराधक, वसुधा प्रेमी, महा जन कल्याणी।
त्वं वन्दनम, सुधि -शुचि विश्व शांति अभिलाषी
भगवान तुम दिव्यज्ञान प्रणेता, महा आयुध प्रक्षेपास्त्र गुरु भारी, दानी
तभी गणित ,विज्ञान ज्ञानार्जन से क्या विपुल दिव्यशक्ति पाई
लेकिन अश्वस्तथामा कोई हो ना जाये इस आधुनिक युग मे
आशंकित जन-धन कहि पाशुपतास्त्र ,ब्रह्मास्त्र कोई चला न दे बन हरजाई
लेकिन भौतिक युग की इस लय में कही विकास कही विनाश, देव-दानव सब परम सुख महिमाधारी महत्वाकांक्षी
गणित-विज्ञान सापेक्षतावाद महा तेज सुखदायी
लेकिन लगे जब हाथ दुष्ट -भागी
अह ! मानवता संकटमय, करे प्रार्थना भारी
सब ज्ञान समन्यव न्यूटन-आइंस्टाइन आधुनिक परशु-सम वे गुरु प्राण भारी
लेकिन विश्व समाज की यही बन गयी है लाचारी
वैदिक युग के महा दिव्य मायावी, आयुधों की महामारी
ऐसा कर महान अल्बर्ट आइंस्टीन पछताए जब जापान में मचाई तबाही
विश्व संस्था भी चंद पांच की कठपुतली जिससे छाई है अशांति
तब मन्त्र बोलते थे लेकर अपना कमाल
माया है और रही है जंहा में महान हाकिन्स भी कहे ,क्यो इंकार
अब यंत्र बोलते हैं, विरल फार्मूलों या सूत्रों को जाने संसार
ओर कर निर्माण करें कार्यान्वयन
मानो सब सूत्रों-सिद्धांतों का ही है जाल
लग न जाऐ ये महा सूत्र किसी सरफिरों के हाथ
ओर छा जाए न कही महा विनाश
परशु ,द्रोण, भीष्म,कर्ण, अर्जुन,एकलव्य
शुक्राचार्य ओर विशिष्ट महा उस्ताद
रावण,शम्भू-निशम्भु,रक्तबीज ओर महिषासुर भव्य
सब मन्त्र-तंत्र-यंत्र ज्ञान साधक ओर वादक
सब ज्ञानी पुजारी पर कोई नीति चहक ओर प्रहरी
ओर हाय ! कोई अनीति प्रेरक-सम्प्रेषक
तीस पर मानवता लज्जायी
हे परशुराम विष्णु अवतारम पाप भूमि पर हुवा है भारी
कर आराधन तेरा हम बने विश्व जन कल्याणी।
तुम परशुरामा , महा वारदाना विश्व कल्याणा
त्वं वंदन, चंदन ,निश्छल जय ,जय कारी हरकारा।
* NK Sevak ” सनातन”
विप्र की परिभाषा बदले
जो ज्ञान धरे वो ब्राह्मण
जन्म ले ब्राह्मण योनि से
पर न हो नीतिगत ओर ज्ञानी
इसी चाह से चार पंक्तिया —-
अहम नरेश कुमार सेवक “सनातन”सहस्र औदीच्य ब्राह्मण असि
पारासर गोत्रं वसुधैव कुटुम्बकम बानी बसी कहता
रामायण के महा अध्याय शबरी को क्यो न आत्मा दिखाई ?
वरना देश मे कोई अन्य धर्म ही न लेता पनपाई
ओर देश अनावश्यक ,अनायास यू न जलता -कुढ़ता
चलो महा लोक तंत्र ने ले महा अंगड़ाई
ओर जाति की हैं महा दूरियां पाटी महान गांधी ने अश्पश्यता की मिटाई परिपाटी
चलो थोड़ा जाति ,धर्म से ऊपर उठ जाए
धरती को सात्विक सचमुच स्वर्ग बनाये।
**जय परशुराम भगवान
N K सेवक “सनातन”