“सनातन के भटकते तुक्तक”
” भटकन तुक्तक”
* वक्त के सायो में मैने गुलामो को बादशाह बनते देखा है ,शेरशाह
कुतुबद्दीन को देखो सच्चा आईना है जो हाथ बांधे खड़े रहते थे उनके सिंघासन ड्योढ़ी के आगे आज वक्त की कहो या किस्मत की -लेकिन तय मेहरबानी से देखो रंगासियार शेर बन के बेठा है । काबिलियतो ने हमेशा पानी भरा है इसका इतिहास बड़ा गवाह है की विद्वान् बीरबल मंत्री मात्र और अपढ़ अकबर बादशाह हुकुम करता है यानि राजतन्त्र की परम्परा के बादशाह बनता है वो भी कई काबिलो महाकाबिलो का।
* आप लिख रहे हैं मै लिख रहा हूं मेने सूना सुन रहा हु
पढता हु सब पढ़ा पढ़ाया जाना पहचाना
कोई भी विषय नया नही लगता वही बासीपन उबासी भरा
हां आपने उसे कुछ नया अंदाज़ दिया है
बात वही है उस शराब सी जो नई बोतल में भरी है मनुहार सी
और यह नज़र है नज़रिए हैं केसे केसे
जिस मधुशाला का कायल हूवा जमाना
जिस रचना को बड़ा महान है बताया
आलोचना समालोचना की भट्टी में
अह महान गोपाल दास “नीरज”बकवास बताते हैं
चलो आपका अपना हक है -आपके आंकलन की क़द्र
लेकिन उन्हें कम आंकना नाजायज नही तो जायज़ नही ।
nk सनातन