~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

रूहानी सुहानी यादे

[4/24, 9:02 PM] Nareshkumar Sevak: ***रुहानी संसार लैला ओर केसों का**
कभी बधाई संदेश पहला तेरा-मेरा तुझको-मुझको पहले पहल आता था
फिर अपनो का अपनो से आता था मगर अफ़सोस
जमाने बीत गए अब बस आता है तो बस रूहानी काल
जिसे कुमार विश्वास की नायाब पंक्तिया में न्याय मिलता है
जिस पंक्ति पर हर दीवाने दीवानी का दिल धड़कता है
तेरा दिल समझता है ये मेरा दिल समझता है
तेरा बधाई ,शुभकामना, मुबारकबाद संदेशा न आया
गर ये इरादत है तो माफ़ किया तुझको
अगर ये मजबूरी तो भी मुआफ़ किया तुझको
क्योकि हर हाल में तू मोहब्बत मेरी मुझको
ओर कभी मैं तेरी चाहत का तुंफ़ा पूछ खुदी से खुदको
समाज की रीतियों-नीतियों ने कई राँझो को रुलाया
हीर मेरी अपने भी हिस्से ये किस्सा आया
अपनी दिलरूबा -ऐ- इश्क हुश्न को तड़पाया
हां तरसाया बिछडाया छलकाया
तू कहे न कुछ मैं कहूं न कुछ
तू तरसे उस पार मै तरसु इस पार समझे जानेजां दोनो मन से
रूहानी मोहबतों का सिर्फ यही अफ़साना रहा
आईना हमेशा धुंधला दास्तान ऐ बया
वहां तेरा यहां मेरा हर जगह हर सिरी-फरहाद का रहा
*🎂जन्म दिन की बधाइयां
अभी बढ़ते भ्रम में
फिर घटते क्रम में!!!!!!
**N K सेवक “सनातन”
[4/24, 9:20 PM] Nareshkumar Sevak: तुझसे बिछड़ रहा हूँ सदा मिलने के लिए
क्योकि बिछोह पर यादो के जहाँन में बहुत बहुत
दिलबरों का दिलबरों से मिलना झूलना होता है
जिस्मानी मोहब्बत से इतर खुदाई रूहानी मोहब्बतों का —यही यही अर्पण दर्पण तर्पण होता है।
*N K सेवक “सनातन”
[4/24, 9:24 PM] Nareshkumar Sevak: ***एक शेर भटकता हुवा***
मुबारक बाद देते तो सार्वजनिक हो जाते ।
तुमने रूहानी तारों से दिल सितारा कर दिया ।।
N K सेवक “सनातन”
[4/24, 9:37 PM] Nareshkumar Sevak: **कोण्टेम थ्योरी ऑफ न्यूटनाइस्तीन **
15 में माइनस 25 का गणित दुनिया मे सिर्फ एक ही शक्स समझता है
या तो वो ही समझता है या फिर मैं ही समझता हूं
क्यो क्यो की ये दिल जो उनका आशना है
बस विपरीत हालात का मामला, ओर मारा है
ये वैदिक गणित है इसका मर्म भास्कर ओर आर्यभट्ट जैसे मर्मज् ही समझते हैं
इसमें सामाजिक मर्यादा कुछ दायरे हैं
जिंदा हो मोहब्त उस पर इस पर अगले जन्मों को लेकर
ये आसमानी आह क्या ये कम बात है
दैहिक आह होती तो छलका देते वो समाज के पैमाने
मगर वो आग रुहानि थी जो सहम गए
मगर आग पे चल के भी जिंदा हैं क्या कम बात है
दैविक आह के किस्से कभी खत्म नही होते
दैहिक किस्से रहते कितने दिन
जानेजा महान शेक्सपियर के फ़लसफ़े को ले
तो फिर सिर्फ चार दिनों की बात है
दूसरा तुम्हारा चल रहा तीसरा हमारा
देखते ही देखते पहला गुजरा बस
कुछ वक्त की बात है
हाथ किसी के नही वक्त को बस वक्त के आगोश में जिंदगी खास है
**N K सेवक “सनातन”
[4/24, 10:08 PM] Nareshkumar Sevak: **एक चीरता हुवा शेर पर शेर**

बीमार होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं!!
बीमार होने पर डॉक्टर किसके पास जाते हैं??
**Nk सेवक “सनातन”

स्वास्थ्य का पर्याय क्या डॉक्टर भी कभी बीमार होते हैं!
यदि होते हैं तो “सनातन”उन्हें डॉक्टर क्यों कहते हैं ?
**NK सेवक “सनातन”

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