Aasmani Silsiley
दुनियावी जिंदगी में मंझिलो के बस भरम है
मंझिलों के नाम सफर यूं खत्म होता है उस मंझिल पे
की वो जो मंझिल नहीं संसार की प्रकृति है हम इसे नियति के नाम विवशता कहते है !!
# राहों ने बहुत रोका जमीन भी धसी सामने से
पीछे हटते भी कैसे पृथ्वीराज को पढ़ा किताबो में
बढ़ते रहे कंटको, आंधी ,तुफा से लोहा लेते
दर्शन तगड़ा हम भी डटे नेपोलियन सिकंदर मार्को पोलो और चाणक्य से
बाधाएं कुछ खुद ब खुद हट गई कुछ को हटाया नजीरों से
मुसाफिर थे राहों के चाहते किस्मत तो बदल देते
पर अपने जमीर से ही होली खेलते रहे
क्योंकि फलसफाई में कर्ण द्रोण भीष्म सी खुद्दारी थी
की मरे भी तो अपनी शर्तो से
निचोड़ ये की निकले तो उसी राह ऐ मंजिल से
और बिना मंजिल के
ही सफर पूरे हो गए मगर बिना मंजिल के भी सुकूं कैसे मिलता है~2
पूछो ऐ दुनिया ‘ सनातन’ हमसे !
☔☔☔🌈☔☔☔
🎻🎻✴️🎻🎻
❤️🏹❤️🏹
*Nk सनातन