The Fascinating Hero
(On Lord Krishna)
Lord Krishna you only the character
Whom we the followers can say the versatile charmer.
At the childhood you a reckless beau
And you so mischievous but lovable lad.
Than you a caring cowherd
And a skilled flute master
And as a young man a deeper lover
But due to a mission leaves emotions.
Thus you prove a big patriotism
At the bank of river Jamuna
You prolifick a lot with friends.
You entice the maiden & bellies a lot
You become a great diplomat
Only to implant legal polity and morality.
By advocating great sermons
You give a great life philosophy
Being the king prospers the subjects
And lastly to prove the fate of man
Embraces the morality.
O’the favourite of followers & devotees
You indeed give us a great joy.
फ़लसफ़ा ज़िंदगी का
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा
अनुभव (तजुर्बा) रहा है अपना-अपना
जीवन को कहा है किसी ने नगमा,
किसी ने कहा है इसे इक नदियां,
किसी ने माना कुछ नहीं,
किसी ने माना इक पहेली।
इत्तफ़ाक़ रखता हूँ मैं भी,
सभी फ़लसफ़ों से जुदा-जुदा
मगर दर्शन मेरा कहता है
ज़िंदगी है कुछ नहीं
है तो बस इंतज़ार जुदा-जुदा,
निचोड़ कहे तो बस-इंतज़ार – 3
कभी सुनहरा तो कभी बेसुरा इंतज़ार,
मगर इंतज़ार बस इंतज़ार
कभी बोझिल, कभी दिलकश इंतज़ार,
ज़िंदगी में ये होगा, वो होगा, सब होगा
अब होगा, तब होगा, कब होगा,
कुछ सफल कुछ असफल प्रयास,
मगर फिर भी इंतज़ार, बस इंतज़ार।
कभी बनते सपने, कभी बिगड़ते सपने,
टूटते सपने, सिमटते सपने
काकामयाब सपने नाकामयाब सपने
कभी हँसते सपने कभी बिलखते सपने
कभी तड़पते सपने तो कभी मरते सपने
कभी सुलगते सपने
क्रमशः (फ़लसफ़ा ज़िंदगी का)
कभी जलते तो कभी बुझते सपने
कभी हल्के तो कभी बोझिल सपने
कभी जागते सपने, कभी सोते सपने
कुछ सच होते सपने,
तो कभी अधूरे छूटते सपने
रोज़-रोज़ कुछ नहीं, इंतज़ार, बस इंतज़ार
सुबह हो तो रात का, रात हो तो दिन का
बचपन हो तो जवानी का,
जवानी हो तो बुढ़ापे का,
कुछ चाहते हुए कुछ न चाहते इंतज़ार
जीने का और मौत अब आए तब आए
बस मौत के आने का दुःखद सुखद इंतज़ार।
ज़िंदगी का सच, होना क्या है बुरा हश्र
जलना या होना दफ़्न
मगर होना राख या मिट्टी ये तय, सच खलता है चुभता है
लेकिन करे क्या है, जमाने का यही कड़वा सच,
जीवन का पहिया, रोकना नहीं अपने बस, उम्र का सफर,
थाम ले, नहीं किसी के बस, ज़िंदगी यूँ ही गुज़रती है, बाहों या
आहों में, कब किस घड़ी थम जाए जीवन का ये सुहाना
बेबस सफर, पहेली अबूझ कब सुलझ जाए है सब बेख़बर।
*नरेश कुमार ^सनातन **
Poem 1: बेवफ़ा वक़्त (Unfaithful Time)
Hindi (यूनिकोड)
बेवफ़ा वक़्त
काश के रंग चढ़ा के तुमने
बदस्तूर रंग बदले ना होते
दुनिया के लिए फ़िक़्र थी इतनी तुम्हे
तो बेख़ौफ़ बाहों में सिमटे न होते।
तुम्हारी नजदीकियां अगर एहसास जन्नत की,
तो दूरियां एहसास कुफ़्र-जहन्नुम, दोज़ख की,
सफ़र ज़िंदगी का धूपभरा, दूभर है,
माना मगर कहा मैं भी महान शेक्सपियर
जो तरसा एक बला काली कलूटी पर।
मैं तो महान ख़याले मिल्टन रखता हूँ।
माना तेरी खुबसूरती का रहा कायल,
लेकिन जान ए मेरे दिलनशीं मरा नहीं हूँ,
शिशा-ए-दिल उतारा तुम्हे, चाहे हूँ घायल,
ख़याले सोच में हमेशा तुझे रखा है
नर्क ही सही नर्क में भी तुझे अपना रखा है।
बेवफ़ा तुझे कहना, है तोहीन मोहब्बत की,
वो जमाने का दस्तूर था नहीं खता उसमें तेरी,
तेरी चाहों का असर सदा रहा रूहानी,
जिस्म क्या हैं ढल जाते है, मर जाते इक दिन,
इसलिए, ऐ मेरे दोस्त मेरे हमदम नाम तेरा मैंने,
हर दिल अज़ीज़ हर भावना से ऊपर,
तेरा नाम मैंने ऐ बावफ़ा ख़ुदा रक्खा है।
ख़ुदा है मिला नहीं आज तलक किसी को
फिर भी मानते है झुकते-मानते उसी को,
फिर तुम तो मिली भी मुझे
दिल के अरमान जिए तूने लिए मेरे,
हमसफ़र-हमख़याल दिलबर मेरे,
वज़ह है यही देखा मैंने तुझमें
वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक है।
जानम मेरे इसीलिए नाम तेरा,
मैंने ख़ुदा हा ख़ुदा रक्खा है।
नरेश कुमार ^सनातन*