गणतंत्र दिवस औऱ भारत

गणतंत्र दिवस ओर भारत
( मेरी कविता वक्र-विषयपरक)
वो भी दूर- दूर प्रजातांत्रिक देशो का दौरा कर
ओर सर्वाधिक समय और मंथन ओर वृहद
देश बड़ा तो जाहिर कानूनी मसौदा भी दीर्घ
ओर गर्वित ऐसे ही हर्षित अपनाया गणतंत्र
साल सत्तर हो गए संविधान को लेकर
ओर आवश्यकतानुसार व्यवस्था संशोधन छूकर
ओर संविधान कोई धर्म पुस्तक नहीं
ओर कोई अंतिम सत्य भी नहीं कि सब पत्थर की लकीर
की संशोधन ओर पूर्ण संशोधन को लेकर हो बवाल
कई देशों ने बदले हैं अपने आमूल-चूल संविधान
भारत अपने देश का अति महान संविधान
समय के साथ आवश्यकता है क्या
हाँ बदलने का अपना उधारी वाला संविधान
वैशाली-कपिलवस्तु दुनिया के चिर गणतंत्र
लेकिन न था इसका कोई उपलब्ध संविधान
यूनान के रोम-स्पार्टा भी प्राचीनतम संविधान
ओर आधुनिक दुनिया का प्रथमेव प्रजातंत्र
जी संयुक्त राज्य अमेरिका गणतंत्र पथप्रदर्शक
अब समयकाल अनुसार बदलना पड़े तो तिसपर क्यो परस्पर
संविधान देश का ही मूल हो परिवेशीय
की सब हो सामाजिक आर्थिक सम स्वतंत्रत समृद्ध
जैसा कि अमेरिका है ब्रतानिया है फ्रांस है
संविधान में जाति का कोई नामो-निशान न हो
सामाजिक समता हो आर्थिक भेद भी क्षीण हो
हां यूरोपियन देशों ओर अमेरिका की तरह
राजनीति अपने स्वार्थ से ऊपर उठे
ओर मतों की सियासत में न देशजनो से मतभेद करे
शिक्षा सर्व प्रकार अकादमिक-व्यावसायिक मुक्त हो
शिक्षालय-औषधालय नैतिकता के पर्याय हो
देश किसान-जवान पर ज्यादा ध्यान दे
तकनीकी ज्ञान के लिए विशेष प्रतिभा को विशेष शिक्षा हो
सिर्फ दो राष्ट्रीय पार्टी देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तानाशाही का अप्रत्यक्ष स्वरूप
हो 40-50 राष्ट्रीय दल हो
जिससे पहले मैं फिर तू फिर मैं बारी-बारी
हाँ का काला विभत्स खेल हो पेल हो
अतएव मैं दोहराऊंगा महान अटल के कालजयी शब्द
आज़ादी अभी अधूरी है मै कहूंगा
मैं कहूंगा प्रजातंत्र भी अभी अधूरा है
आरक्षण ,धारा 370 नासूर हैं देश की व्यवस्था पर
समान ओर मुक्त शिक्षा सबको हो सुलभ
ओर रोजगार के अवसर हो सबको समान
तब प्रतिभाएं चुनी जाएगी जाती नहीं
कुछ भी मुक्त न हो सियासत वोटो के नाम पर
सब सम्पन्न हो समृद्ध की वहन करना सब हो आसान
तभी गणतंत्र हमारा जनपद स्वर्गिक हो जायेगा
संविधान अदोषपूर्ण पवित्र पुस्तक हो जायेगा
अभी बवाल इस पर की असमता के कुछ नासूर
देश भुगतान रहा बात बात पर।
*NK सेवक “सनातन”