~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

मजबूर कहे या मजबुर एक ही बात !

मजबूर कहे या मजबूर एक ही बात
[ मजदूर दिवस पर देश की जान मजदूरों को समर्पित]

मजदूर की परिभाषा सिर्फ तगारी -कुदाली-फावड़ा-मिट्टी उठाना ही है तो गलत है।
इस दुनिया का हर व्यक्ति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष या तो नोकर है या सेवक
बस नाम अलग है दोनों का मायना एक ही है।।
nk सनातन मजदूर ओर मजबूरी*
(लेकिन ये मजबूरी ही सारे काम बनाती है
जान है मजदूर ये ही देश मजबूत समृद्ध बनाती है)

मजदूर बेचारा मजबूर तभी कड़ी धूप में रुकता नही
दो जून रोटी उसका दैनिक मसला जो थमता नहीँ
उसे देख दया किसे आती है किसका मन पसीजता है
गर्मी में श्रम सस्ता जो हर कोई मजदूर नहीं
हां मजबूर नही ढूंढता मजबूर ढूंढता है
कल 42 डिग्री तापमान पर तिलमिलाया पारा था
लेकिन मैं देख रहा था किसी मजदूर के चेहरे पर
हां पसीना तो था लेकिन हौसला उफान पर
शिरकत शिथिलता का कहि नामो निशान न था
तापमापीया तो सिर्फ अमीरो के लिए है
मजदूर मजलूम को कब कहा सर्दी और गर्मी लगती ह4
ओर ऐसा अहसास रसूखों को जरा भी होता
तो तो ये ऊँची आलीशान इमारतें कड़कती सर्दी
ओर हां पिलपिलाई गर्मी में बनते नही दिखती।
जो मजबूर आलीशान बहुमंजिला बहु कक्षीय इमारत का है निर्माता
अफसोस उसे एक छत भी ठीक सी नसीब नही होती
ओर मजदूरी वो विषमता है कि ये बारहमास नही मिलती।
N K सेवक ”सनातन”