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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

मेरे पिता मुझमें जिंदा हैं

मेरे पिता मुझमें जिंदा हैं

मेरे पिता मुझमें जिंदा है !

+दिनांक 16 जनवरी उनकी पुण्य तिथि पर मेरे द्रवित उद्गार +

16 जनवरी मेरे पिताश्री का देवलोक गमन दिवस और वो दिल तोड़ने वाली घड़ियां …कड़वी यादों के सैलाब में !

[मेरे पिताजी हमारे गांव के पहले बीजेपी अध्यक्ष थे तब श्री अटल बिहारी बाजपाई जी के नेतृत्व में भाजपा नई नई अस्तित्व में आई थी…और अपने पहले लोकसभा चुनाव में बीजेपी की मात्र राष्ट्र स्तर पर तीन सीट आई थी और आश्चर्य खुद दल के रहबर बीजेपी प्रमुख यानी अध्यक्ष अटल जी भी चुनाव हार गए थे अपने गृह जिले से कद्दावर कांग्रेस नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा से…!! आज 16 जनवरी,2023, भोमवार यानी सोमवार ….तब 16 जनवरी,1990, मंगलवार था ….यानी इक वो 16 जनवरी,1990 थी…..जिस रोज अचानक ही उस सुबह 6 बजे के आस~पास हमने (मैं ,मेरे भाई बहन) ने अपने पिताश्री को खो दिया । उस समय डायबिटीज रइस लोगों की बीमारी थी और आम जनों में प्रचलित होकर मशहूर न थी…. इसलिए डायग्नोस नहीं हुवा…मेरे पिताश्री चेन स्मोकर थे (उस दौर में कोई भी मर्द बीड़ी,तंबाकू ,हुक्का, अमल सेवन(but being an orthodox conservative Brahmin completely away from non veg एंड वाइन और whiskey but being मुंबईकर fond of gambling and being big devotee of Lord शिवा sometime prefer Pot or hemp or cannabis ) के से वंचित और भयभीत न था और शौकिया तौर और नशेमन सामाजिक रिवाज और जुनून आम था )…..यानी दिन के चार बंडल येवला बीड़ी (गुजरात नासिक प्रोडक्ट ) और इक पैकेट केवंडर सिगरेट वो पीते थे…जिससे उनका हार्ट भी कमजोर हुवा होगा ….और दिन में 10~15 चाय (क्योंकि खुद का ही ग्राम स्तरीय होटल था और अब भी है हालाकि अब बड़े स्तर पर व्यवसाय जिसमे इक जनरल स्टोर और दूसरी नमकीन कचोरी~समोसा की शॉप है) वो भी गुजरात कल्ट वाली (कड़क अने मीठी शाही चहा)….मेरे पिताश्री की उम्र उस समय मात्र 55 ही थी और अचानक उन्हें डायबिटिक अटैक आया था किडनी भी वीक अवस्था में होगी उस वजह से….वैसे इससे पहले कभी भी मेरे पिताजी बीमार नहीं हुवे न कभी हॉस्पिटल ….बस अंतिम दो माह से वो थोड़े बीमार चल रहे थे हालाकि बिस्तर नहीं पकड़ा था…अंतिम दो माह में इक बार हॉस्पिटल ले गए वहा डॉक्टर ने डायबिटीज बताया….और फिर घर फिर दो माह बाद अचानक तबीयत बिगड़ी… उन्हे पिछले दिन मोडासा (गुजरात) ले जाना तय था लेकिन अगली सुबह ही मेरे अग्रज श्री एवम मेरे सामने और मेरी माता जी,छोटी बहन के सामने उन्होंने अंतिम सांसें ली हालाकि मैं अंतिम सांस की अवस्था में लोकल डॉक्टर साब को लाया उन्होंने चेक किया और कोई रिस्पॉन्स नहीं उन्होंने सॉरी बोला और हमारी दुनिया लूट गई….. । उस दिन हम भाईयो ने पिता जी को खोया लेकिन इक देवी ,इक महिला (हमारी माताश्री जिन्हे हम जिया कहते है यानी ह्रदय , जान ) ने अपना सब कुछ यानी पूरी दुनिया को खोते हुवे देखा यानी हमारी माताश्री ने अपने पतिदेव को खोया । वो दिन हमारी जिंदगी का सबसे मनहूस दिन रहा । मै और मेरा अनुज दोनो उदयपुर विद्या निकेतन में as a टीचर जॉब में थे और दिनांक 15 को सूचना मिलने पर हम दोनो रात को नाथद्वारा बरोड़ा एक्सप्रेस से घर पहुंचे …पिता को देखा मिला पिता बहुत खुश हुवे लेकिन मैने कहा पापा कल सुबह बात करेंगे क्योंकि हम रात डेढ़ बजे पहुंचे थे क्योंकि बस का वहा पहुंचने का समय ही यही था …फिर है सो गए अचानक बड़े भैया ने मुझे उठाया 5 बजे के करीब की पापा की हालत नाजुक हो गई है मैं चील्लाया पापा हू हू कर रहे थे बोल नही पा रहे थे ….मैं भागा लोक डॉक्टर साब को बुलाने ….लेकिन तब तक देर हो चुकी थी मेरे पिता गहरी नींद में सदा के लिए सो गए थे यानी मेरे लिए रात को कहा था की पापा अभी आप सोए सुबह बात करेंगे …अफसोस वो सुबह आई ही नहीं…!!!!
16 जनवरी,1990 के बाद कई 16 जनवरियां आई ..गई और सब अच्छी रही सिवाय उन कड़वी विषम यादों के अलावा ! बच्चो से पिता का साया छीन जाना, इक पत्नी के पति का दुनिया से चले जाना जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी और कमी होती है। हर बच्चे के लिए उसके पिता और माताजी से बढ़कर कोई नायक नायिका नहीं होते अतः मैं अपने पिता की शान में कसीदे पढू न पढू कोई फर्क नहीं पड़ता । ये इक सार्वजनिक, सार्वभौमिक सत्य है । सभी बच्चो के लिए, हर पत्नी के लिए उसका शौहर दुनिया के सबसे कीमती और नायाब शख्स होते हैं ! मेरे पिता का जब देवलोक गमन हूवा तब मेरी उम्र मात्र सत्ताइस साल थी । और कई सपने पालने वाला नरेश इक शिक्षक की नौकरी को विवश हुआ क्योंकि थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा था और पिता के बिजनेस (गांव में होटल) में रुचि न थी और साफ जाहिर है की उस समय अध्यापक की नौकरी इक विवशता रही लेकिन बाद में नशा फिर शौक फिर पूजा ….!!!!
खेर इस विषय में कहने को इतना है की 5~6 कापियां भर जाए …..
बस आज का दिन बस उस मर्म को कुरेदता हैं और कुछ समय के लिए नैराश्य में ले जाता है लेकिन व्यक्ति जब तक उस दुख उस शोक को पाले क्योंकि महान गीता के दर्शन में साफ
उद्दत हैं की मरने वाले के लिए ज्यादा आंसू बहानें,शोक करने पर मृतात्मा को दुख होता हैं…. और अब वो आत्मा (हिंदू सनातन मान्यता अनुसार) किसी और योनि या किसी और दुनिया में हैं और शोक करना फिजूल है लेकिन आखिर पिता के मृत्यु का दिन.. तो टूटे बिना कैसे रहा जा सकता है… उस रोज हमारे पिता निस्तेज पड़े थे नजदीकी और समाज जन , ग्रामीण जन अंतिम क्रिया के इंतजाम में थे ….मैं और मेरे बड़े भाई साब नही रोए क्योंकि हमारी मां को ढाढस बंधाना था संबल देना था….लेकिन फिर उदयपुर आ कर दुख का सारा झरना बहा मैं फूट फूट कर घंटो रोया…उस रोज बस विलाप रूदन रोके रखा लेकिन आंखों से अनवरत
अश्रुधारा नैसर्गिक रूप से बहती रही…! आखिर हम आदमी हैं फरिश्ते नहीं और दुख उड़ेलने, साझा करने से न्यून होकर शुन्य हो जाता है.. ! बस मेरे बस में यही है की मैं अपने पिता श्री को आत्मीय दैविक नमन करू।
ॐ नमः शिवाय !!!!
इस कड़ी में मेरे पिता का जन्म दिन दिनांक 12 जनवरी को पड़ता है लेकिन आज जन्मदिन की खुशी और ठीक पांच रोज के बाद जीवन आकाश का लूटना सो मन के उद्धार उभरे पर उनके जन्मदिन पर कुछ भी उकेरने को जी नही किया…..और उस दौर में मेरे पिता के जन्म दिवस पर खीर या शीरा यानी देशी हलुवा बनता था…..
उस समय जन्म दिन की वर्षगांठ के उत्सव (बड़े~छोटों के) आज की तरह आम नहीं थे….
एंग्लो इंडियंस और रसुखो की बात और थी और है….
हां मृत्यु के बाद सामाजिक शोक दावत उत्सव (बारमा या करियावर या मृत्युभोज) बड़े आम होकर खास थे
धन की वैल्यू बहुत थी
लेकिन लोक लाज के घेरे और आईने में सामाजिक दायरे में ये अनिवार्य थे…..
उद्देश्य यही रहा होगा और है की दुनिया से चले जाने वाले के लिए आखिर कब तक शोकतुर रहे दुखी रहे उन्हे उसे भुलाना ही इक मात्र विकल्प …..इसलिए श्रीगीता में श्री कृष्ण मधुसूदन सुदर्शन नारायण ने श्री पार्थ से कहा~मरने वाले पर शोक करने पर हुतात्मा को स्वर्ग में अशांति मिलती हैं अतः प्रियजन आप हैं तो उस बिछड़े प्रियजन के लिए शांति पाठ करे,पूजा करे शौक सिर्फ 12 दिन मनुष्य स्वभाव के कारण लाजमी है…वरना इस नश्वर और क्रूर दुनिया का सत्य सब जानते हैं….!!!!!
*NK सनातन
अपने मन के श्रद्धा सुमन के चमन से