स…म…..य !!!
“समय”*
वक्त जन्म अनन्य मरण
वक्त अर्थी वक्त जनाजा
वक्त सरगम वक्त मातम
वक्त डोल वक्त अर्थी
वक्त जीवन वक्त श्रृंगार
वक्त जवानी वक़्त बुढ़ापा
वक्त बचपन वक़्त लड़कपन
वक़्त रुतबा वक्त चरखा
ऐसे घूमता कभी उठाता
कभी गिराता कभी हिलाता
कभी दहलाता कभी हर्षाता
वक़्त के साये सांझ सवेरे
वक्त के साये रात अकेले
सुख-दुख होते सिरहाने
हंसते -गाते कुलबुलाते
उठते ही उठ आपाधापी
तकते थकते राजी राजी
जीवन की जरूरते जुटाती
हैं सब कुछ कहां मदमाती
वक्त रहस्य वक्त पहेली
उलझी उलझी चाहे सुखद
मौत पर हो जाती विशद
आधुनिक युग फ़ोटो टंगती
गाहे बगाहे साफ़ की जाती
युग वो भी था सुविधाहिन
औऱ छवि बसती थी आंखों
कीमत जिंदगी थी लाखों
वक्त की आगोश में सब
मानवता के मायने हो अब!!
*N K सेवक “सनातन”