~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

क्या उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता

*उन्हें फर्क नहीं पड़ता
जी देश मे तीन -चार वर्ग हैं आर्थिक दृष्टिकोण से – अति उच्च वर्ग, उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और विपन्न वर्ग। अब देश – दुनिया ने अचानक उभरे कोरोना महामारी को झेला । अनगिनत लोग इससे अलग-अलग रूप से पीड़ित एवं प्रभावित हुवे। दो वक्त का भोजन सबसे बड़ी समस्या हो गयी। जो वर्ग आर्थिक रूप से सबल एवं सक्षम थे को कोई फर्क नहीँ पड़ा। रातों-रात राशन-पानी संग्रहित कर लिया 6-7 माह का ओर दूसरी तरफ वो बेचारा मुफलिसी या गरीब वर्ग जो असहाय था दैनिक जीवन की वस्तुएं बामुश्किल जुटा पाता था असहाय हो गया क्योकि छोटा-मोटा रोजगार जो उन्हें बड़ी मुश्किल से मिलता था कोरोना19 की वजह से शून्य हो गया। लेकिन इस वर्ग की पैरवी करने या तो सरकार हमेशा अग्रसर हो जिम्मेदारी निभाती है ओर ऐसी कई स्वयंसेवी संस्थाएं ओर लोग हैं जो उन्हें किसी तरह से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद हाथोहाथ पहुँचाती हैं। यानी मनमाफिक नहीं ज्यादा भी नहीं लेकिन जीवन पल जाता है जैसे-तैसे ऐसी मददी पहल से। तो सवाल अब उस वर्ग का जो मध्यम कहलाता है का कौन ? मध्यम वर्ग इज्जत को लेकर काफ़ी चिंतित ओर सजग रहता है का क्या। सबसे पीड़ित यही तबका रहा जो कोरोना काल मे निरापद रहा जिसका संज्ञान किसी ने नहीँ लिया। वो वो बेचारा हाथ नहीं फैला सकता। मध्यम वर्ग में जो राजकीय महकमों थे उन्हें फर्क नहीं पड़ा ओर न ही उन्हें पड़ता है क्योंकि सरकार उनकी हमेशा हितेषी रहती है और महंगाई भत्ता , इन्क्रीमेंट आदि समय-समय पर बढ़ाती रहती है! तो निचोड़ यू ठहरता है कि जो मध्यम वर्गीय परिवार हैं वो ऐसे विषम काल मे काल का ग्रास बनते हैं जिनकी सुध सिवाय ईश्वर के लेने वाला कोई नहीं। यहां मध्यम होने का बहुत बड़ा खामियाजा भुगतना ही इस वर्ग की तकदीर है। काश की सरकार और सरकारें इस वर्ग की भी व्यथा संज्ञान में ले एक विशेष व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें भी राजकीय सुविधाएं मुहैया कराए। ये वर्ग उन मूक पालतू जानवरों की तरह है कि मालिक समझे उनकी त्रासदी तो ठीक वरना बेचारा ही रह तड़प जाए।
माध्यम वर्ग देश की रीढ़ है और इसका विस्तार ज्यादा है। शिक्षा के सहज अवसर , आरक्षण, शिक्षा ऋण ने शिक्षितों की संख्या में बढ़ोतरी की है और राजकीय ओर निजी विभाग में नोकरी के अवसर भी बेतहाशा बढ़े है। लोग जाति-पाति से ऊपर उठ अपने पुश्तैनी पैतृक व्यवसाय- धंधे – काम- काज छोड़कर शिक्षित होकर अच्छी खासी नॉकरी ओर व्यवसाय करने लगे हैं और उनकी आय में अविश्वसनीय वृद्धि हुई है और ये मध्यम वर्ग थोड़ा पाश्चात्य होकर धनिक वर्ग की वर्ग नहीँ लेकिन उनके स्तर की सुख- सुविधाएं जुटा अच्छी जिंदगी जी रहा है यानी वो ऑडी या फरारी कार तो नहीं खरीद सकता लेकिन मारुति 800 ओर बेलेनो कार अपने घर के आगे खड़ी कर खुद ड्राइव कर सुकून पाता है । वह ड्राइवर वहन नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही 25-50 के प्लाट पर एक मकान बना कर इस मानसिकता में जीता है कि टाटा-बिड़ला , अम्बानी-अडानी-प्रेमजी न सही अपने मन के बिड़ला हैं। लेकिन ऐसी विपरीत परिस्थितियों में जो प्राकृतिक आपदा से आई उसमे मदद से उसे वंचित किया जाता है इस पर सरकार सरकारों से गुहार है कि भविष्य में उन्हें भी क्राइटेरिया में रख सुविधाएं प्रदान की जाए। आखिर वो भी तो वोटर्स हैं।
*nk सेवक ” सनातन”