~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

बुढ़ापा खुशकिस्मती कहे या बदकिस्मत

बुढ़ापा खुशकिस्मती कहे या बदकिस्मत
यदि मन~तन स्वस्थ उम्र दराज होने के बाद भी
तो समझे बुढ़ापा स्यापा नही वरदान है !
*Nk सनातन
*गद्यात्मक कवित्त*
वो जवान बहुत जवान रहे कभी
कुछ बूढ़ा रहे कुछ बूढ़ा चुके है
तुम भी निगेहबान बन गिरेबान में रहो
जानते हो तुम तुम भी सदा ऐसे नही रहोगे
बुढ़ापा तुम देखोगे बड़ा लंबा
देखते है तुम बदकिस्मत हो कितने खुशकिस्मत निकलते हो
ये देखना हर किसी के किस्मत में नही
बहुत कम लोग होते है
जो ये दौर देखते है शैशव काल या अवस्था आई
कुछ बारे इसके हमे याद नही
पूंजी वो नही हमारी
गर हैं तो हमारे माता~ पिता की
फिर प्यारा बचपन
दुलारा लडकपन आया
याद कुछ बहुत कुछ ले सुहानी चांदनी
फिर आई न्यारी जवानी
जिसमे जिंदगी से खेलने कम
हां लड़ने की बड़ी किस्सा कोताही
देखते ही देखते रफ्तार से उजालों अंधेरों से झिलमिल झिलमिल बीती जवानी
और हो लिए अधेड़ कब
जब सर के बालो में देखी कुछ सफेदाई
बढ़ी चिंता की अब आ गई दोपहरी
इस दौर में अधिकतर जीवन से आसक्त
क्योंकि होता स्थाइत्व रोजगार को लेकर
यानी साफ है होता न्यूनतम संघर्षों का दौर
फिर जाने देखते ही देखते आ जाती जीवन की शाम
जो स्थाई रोजगार धारी रहे
नही आर्थिक कमी का अहसास
जो नही बेटे बेटियो पर आश्रित की आह
करे तो ठीक नही तो ठीक
नही तो जो होना है बस महामना के नाम
अब कितने भाग्यशाली और अभाग्यशाली है आप
यानी कितने उम्र साठ के पार जाते है
और कितने सत्तर के
दोनो ही बात
बुढ़ापा जो की दर्शन में स्यापा
यानी आश्रित अपनो पर
या की दूसरो पर
चाहे हो आर्थिक संपन्न
शारीरिक कायिक रूप से सब विपन्न
यानी दैहिक रूप से बुढ़ेऊ कंगाल
तो दो दृष्टिकोण
उम्र देखे लंबी आप किस्मतवान
और बुढ़ापे की शारीरिक मानसिक व्याधियां
अफसोस कहते बदकिस्मती की
अआत्मनिर्भता का दौर हिस्सा
चीन बूढ़ा गया है
कोरोना काल में साथ उन वृद्धि के
अफसोस बड़ा अन्याय हुवा है
उनके इलाज पर ध्यान नहीं दिया जाता है
कह की वैसे ही मरने वाले है
क्यों धन और समय नष्ट किया जाना है
और युवाओं को ही इलाज दिया जाता है
वैसे किसी राजन के काल में
जब वृद्धों को मारने का फरमान
सब मार दिए जाते है
लेकिन इक युवक अपनी मां को छुपा लेता है
जब आपत्ति आती है रियासत पर
वह सलाह देती है
और…युद्ध टल जाता है
संधि का सौहार्द बंध जाता है
तब राजा खुद महसूस करता
हां की ये इतनी श्रेष्ठ बौद्धिक सलाह
सिवाय बुजुर्ग के कोई दे नही सकता
ये गुस्ताखी किसने की
वह नौजवान बेटा आगे आया
उसने अपना जुर्म कबूल फरमाया
राजन ने कहा उस वृद्धा को। दरबार में पेश किया जाय
बेटा सहमा सा डरा सा
वृद्धा भी गबराई सी
लेकिन ये क्या
राजा एलान करते है की
मुझसे बड़ी भूल हुई
वृद्ध देश पर बोझ नहीं
अनुभव और बौद्धिक क्षमता का भंडार है
इस बेटे और उसकी मां को हीरे जवाहरात जमीन इनाम में दी जाय
और आज से किसी को अपने वृद्ध को छुपाने की जरूर नही
उन्हे देश की श्रेष्ठ पूंजी मानी जायेगी!
*Nk सनातन

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