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NK Sanatan's Writing Treasure

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Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

भारत: बैंकों का राष्ट्रीयकरण !?

बेको का राष्ट्रीयकरण
राष्ट्र हित के लिए एक शानदार कदम था लेकिन मैं व्यक्तिशः इस कदम का स्वागत करू जो आप देश की महान दूरदर्शा प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने लिया था लेकिन इससे पूर्व एक आप बीती ( वर्ष 2008 / 2010 ) का जिक्र करू इन महान राष्ट्रीय बैंकों में दो महान बैंकों और उनके कर्मचारियों के शालीन,भद्र, सहयोगात्मक रवैये का। ये दो महान बैंक उदयपुर से हैं– SBJJ जो अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मर्ज हो गया है ।मर्ज शब्द अंग्रेजी से समझे हाँ हिंदी से समझे तो एक अर्थ में अलग अर्थ निकलेगा लेकिन दार्शनिक रूप से सत्य यो की मर्ज (merge ) समजे तो समायोजन ओर उर्दू में समझेंगे तो दर्द ओर ये बैंक दर्द के परिचायक है क्योकि ये भरे पेट को ही रोटी देते नही वरन और आगे चल कर पूछते हैं ये लो भोजन खाओ ओर खाओ, पोष्टिक खाओ, स्वादिष्ट खाओ ! यानी ये महान हितेषी बैंक एक गरीब,एक जरूरत मंद को ऋण या लोन नहीं देती वो सहज-सहर्ष लोन देती हैं पर राजकीय कर्मचारियों को,बड़े व्यवसाइयों, व्यापारियों, उध्धमियो को आगे चल कर लोन देती है । इक गरीब या मध्यम वर्गीय व्यक्ति को लोन नही देती, घुस ओर बड़े धनाढ्य व्यक्ति या राजकीय कर्मचारी की गारंटी तो समझे कि अगर ऐसा होता ओर अगर उस शख्स की वो हैसियत होती तो बेचारा वो बैंक से लोन ही क्यो लेता ! यानी साफ है ये बैंक सर्फ धनी ओर रसुखि वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। पहले प्रधानमंत्री बेरोजगार लोन सुविधा थी जिसमे एक मेट्रिक ( 10 वीं ) पास व्यक्ति को 25 हज़ार ₹ लोन विथ सब्सिडी लेकिन उस पर बड़े अधिकारियों ने खूब हाथ साफ किये घुस लेकर लोन देकर ! यानी साफ बात है चाहे मोदी राज है जो सहज ओर त्वरित लोन मुहैया कराने की बात करती है लेकिन सिद्धान्त में ये प्रभावी है लेकिन व्यवहार में ये आज भी चक्रम-वक्रम ओर भक्षम है।
*हाँ अब में अपने उन दो कड़वे अनुभवों पर आता हूँ कि एक बार मैं राशि आहरण करने गया सहकारी बाजार SBBJJ ,शास्त्री सर्कल ,उदयपुर शाखा स्मरण रहे कि अब ये बैंक SBJJ में समाहित हो गया है। मै ठीक 1:40 PM पर बैंक केश काउंटर पर पहुँचा। 1PM या 1:30 PM से 2 PM लंच होता था । लंच 2 बजे खत्म हो चुका था काउंटर पर कतार थी। अंदर जिम्मेदार कर्मचारी गप्पें ह
हांक रहे थे सिगरेट( तब सार्वजनिक जगहों पर प्रतिबंध न था) पी रहे थे चाय का दौर भी चल रहा था मोबाईल से बातें भी (तब मोबाइल आ चुके थे ) चल रही थी यानी साफ़बात कि कोई भी 15-30 मिनिट ऊपर होने पर भी सीट पर नहीं बैठा था ! कोई आवाज़ उठाने को तैयार न था । मैंने कहा तो रुको आते हैं लेकिन फिर भी 10 मिनिट हो गए वो कर्मचारी चिढ़ गया था। मैं तुरन्त बैंक मैनेजर के चेम्बर में गया और कहा,” सर् 20 मिनिट से ज्यादा समय हो गया कोई सीट पर नही पूछा तो रुको थोड़ी देर में वो आ रहेह हैं। बैंक मैनेजर जो लाचार हो कह उठा, ” अरे कही इधर-उधर गये होंगे थोड़ा रुक जाओ आ जायेगे..! अफ़्सोस अब क्या हो सकता था जब सर् ने ही जवाब दे दिया..! खेर 15 मिनिट के और पीड़ादायक इंतज़ार के बाद राशि निकाल सिस्टम पर झल्लाते हुवे,कुढ़ते हुवे निकल गया कड़वे अमूभाव के साथ जो आज भी मेरी डायरी में दर्ज है ।
*दूसरा वाकया की मुझे SBI जो देश का सबसे प्रतिष्ठित ओर वृहद बैंक है में किसी कारणवश खाता खुलवाना था । मैं सेक्टर 4 मैन रोड वाली ब्रांच पहुचा तो वहां बैठा खाता खोलने वाला कर्मचारी मुझे पूछता है और कौन-कौन सी बैंक में खाते हैं । मैंने कहा ,” ओरिएंटल बैंक ,बड़ोदा बैंक,SBJJ बैंक ….उसने कहा ,” फिर क्या जरूरत है यहां एकाउंट खुलवाने की ओर कहां की यहाँ खाता नहीं खुलेगा ।
*यानी ये दो कड़वे तजुर्बों के साथ मैं आज भी ताज़ा हूँ और देश की सिर्फ बैंक ही नही सब डिपार्टमेंट निजी हाथों में हो। आपने -हमने महान BSNL की दादागिरी-लचरगिरी देखी है …मैंने लोकल लेण्डलाइन फोन के लिए 4 साल चक्कर लगाए तब भी नही और बड़े रिकमेन्डेशन पर फोन लगाया। ठीक इस तरह गेस सिलेंडर कनेक्सन के लिए 5 साल तक चक्कर लगाए। मूक लेकिन महान दूरदर्शी अर्थशास्त्री ओर देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की मेहरबानी की उन्होंने वैश्वीकरण ( ग्लोबलाइजेशन) किया देश मे ओर आज उन सब क्षेत्रो-विभागों की तानाशाही समाप्त प्रायः है!
*nk सनातन