भौतिक बयार औऱ प्रकृति
भौतिक बयार ओर प्रकुति
ईश्वर दिखता नहीं , करो महसूस तो होता है
दुनिया अद्भुत , जहां – तहां रूप उसका झलकता है
समस्याएं जग की हैं अनेक, आईना कहता है
आधुनिकता है हावी प्रकुति पर, वर्तमान कहता है । 1 ।
पर्यावरण खतरे में कहते सब, अमल करता कौन ?
उपभोगवादी हम सब , सुविधाएं कम करता है कौन ?
शिक्षा, रीति, नीति सब देशों की एक सी
मानव असल धर्म से परे ,दानवता दशमेश सी । 2 ।
आइंस्टीन – न्यूटन रोते ओर सब विज्ञानि जो हैं अस्त
बृहस्पति कम शुक्राचार्य के आईने से अधिकतर ग्रस्त
तुम नवाज़ों बिरलों को लेकिन वो हैं त्रस्त
मैं ईश्वर कोसु उनको ,वो तानों से पस्त । 3 ।
भोतिक सुख देंन ‘उपहास मेरा’ मानव करे अट्टहास
प्राकृतिकता का करे उल्लंघन , मेरी सत्ता का परिहास
तुम विज्ञानी सब अपराधी, मनुज कारण तुम्हारे भोग -विनाशी
स्वर्ग सा सुख भुगत रहे ,कृत्रिम सारे धरतीवासी । 4 ।
नियंता भाग्य- विधाता विचलित चित्रगुप्त का खाता गड़बड़ाए
व्यक्ति कोई तो मरे असमय कोई बाद इतराये
सब विज्ञानी खलनायक
सो भेजा नर्क के द्वारे
गर सुधरो तो वो मनीषी पुनः स्वर्ग पाए । 5 ।
इल्ज़ाम तुम पर , कारण तुम्हारे दुनिया दानवता अपनाए
भुली वो उस तरक्की के असूल
लिए भोतिकताये
सनातन ओर सारे धर्म शास्त्र, मिल्टन- मार्लो कालजयी चेताये
पर मानव तू कहाँ मांने ,बिन सबक सिखाए । 6 ।
अब तय कर तू है मानव या दानव
अगर मानव तो महसूस कर , बन प्रकुति जानम
अब दूषण ही अवतार समझ तू अब-तब खत्म’
सोच, याद कर धर्म अपना , है अभी भी वक्त । 7 ।
संभल कहे तू कहे वो , पर शुरुआत हो किससे , कब ?
सभ्यता और जीवन विनाश के कगार पर ,अब कर बस । 8 ।
*N.K. सेवक “सनातन “