युयुत्सु: महाभारत का एक महापात्र
**** ***युयुत्सु
धर्म -अधर्म का मुद्दा हर सभ्यता में रहा है
असभ्यत-सभ्य का द्वंद्व हर दौर में रहा है
कौन सभ्य कौन सभ्य वाद-परिवाद मुद्दा है
देव-दानव का अपना-अपना पैमाना रहा है
गुरु वशिष्ठ गुरु शुक्राचार्य हर काल मे रहे हैं
संसार महाऋषि कश्यप दिति- अदिति संसर्ग का परिणाम है
एक से देव एक से दानव का अवतरण हुवा है
क्या है धर्म क्या है अधर्म क्या नीति क्या अनीति
साधारण सरल सहज समजो तो उपज विधि
क्या हाँ जब सिंहराज मारे कीसी मृग को
तो वो उसका धर्म है हत्या कतई नहीं है
सिंह निर्दोष है क्योकि प्राकुतिक रूपेण उसे यही ज्ञात है
ओर असभ्य युग मे निर्दोष हत्या जायज
लेकिन सभ्यता का दौर सब साधन उपलब्ध
तो निर्दोषों की हत्या है क्या जायज
नहीं कतई नहीं सर्वाथ नहीं नहीं नहीं
आओ अब देखे महाभारत रामायण का माज़रा
क्या अनीति क्या सुनीति कुछ उदारहण आला
श्री राम द्वारा रावण वध जायज नीतिकर
लेकिन बालिराज का वध अवैध अनीतिकर
क्यो क्योकि एक प्रत्यक्ष अपराधी
दूसरा परोक्ष
फिर सवाल मित्रता ओर जरूरी दलन आततायी
छुपकर मारना श्रीराम की मजबूरी
क्यो क्योकि बाली था ब्रह्म वरधारी
ऐसे में एक धर्म बचाने एक धर्म अपनाना था
इसलिए बिगड़ा नहीं श्रीराम का बाली ने
लेकिन तय वो वर का उपयोग अनीतिगत कर रहा था
महा लक्षमण का नासिका कट शूर्पणखा खा
क्या कोई और विकल्प न था लक्ष्मण के शास्त्र में
केकयी जैसी ज्ञानी महारानी विवेक खोती
हां धर्मी होकर लेकिन खुद पुत्र भरत ने कहा अधर्मी
बात महाभारत की तो कुटिलता से भरी
पिता को पसंद अनिध्य सुंदरी सत्यवती
देवव्रत बने भीष्म निभाने धर्म बलवती
राज्य सर्वोपरि सो द्रोपदी चिर हरण के मूकसाक्षी
जब दोष पांडव का की धुत क्रीड़ा में हारे सब कुछ
क्या करे भीष्म द्रोण कृपाचार्य महारथी
पैतृक सम्पत्ति हर काल मे रही एक प्रपंच
ऐसे में कैसे छूट जाता महा कुरु वंश
फिर राज्य आधा आधा पर फिर क्यो होता सुयोधन राजी
दुर्योधन ही होना था उसको बन काज़ी
फिर क्या नियम था राजतंत्र
ज्येष्ठ संतान राजा की हक सिंघासन
तो हुकुकी हक किसका ????
सिर्फ सुयोधन का गर बात हो धर्म की
लेकिन फिर दूजा आईना
क्या ये की अन्ध धृतराष्ट्र ने खुद बिठाया अनुज श्री सिंघासन
ओर तब पांडुराज बनते हैं राजवर
ये एक राजनीतिक समझौता
की अंध कैसे करे रॉज सत्ता-जनता का
अब रानी कुंती का मन्त्र प्रयोग
ओर पांच पुत्र देव नियोग
ज्येष्ठ बनते युधिष्ठिर
तब जेठानी भी करती तप
ओर उनके भी होते शत सुत
यानी जाहिर है युधिष्ठिर ज्येष्ठ
लेकिन बात धर्म की
यदि धृतराष्ट्र होते राज्यासिन
तो चाहे पांडव के होता पहला पूत
वैधानिक राजा का ही होता राजा ज्येष्ठ पुत्र
लेकिन बात फिर धर्म की
पिता की संपत्ति पर सब कुछ आधा आधा
लेकिन फिर धर्म की बात
नहीं हुवा ऐसा कभी लिए राजतंत्र का आईना
लेकिन बात 14 बरस के वनवास
जो नहीं था जायज़ एक खून एक प्राण
फिर आना उनका सिर्फ प्रश्रय को आश्रय को
नहीं गवारा सुयोधन को सो था अब दुर्योधन
फिर समझाइस कोई और नही विष्णुअवतार
लेकिन केशव की कौन बाते मान
केशव जनार्दन दोनों के नाती समान
अब लड़े तरफ किसके छोड़ा स्वयं दुर्योधन भार
दुर्योधन एक संसारी भोतिक व्यक्ति मात्र
अगर न होता तो ये नोबत आती ही क्यो त्राण
इसलिए मति गयी मारी उस अत्याचारों दुराचारी
ओर मांग लेता है अठारह अक्षुणि यादो सेना
ओर दिया कृष्ण सुदर्शन को पांडव सेना
बात अब फिर धर्म – अधर्म की
भीष्म अपने राज्य धर्मवश
गुरु द्रोण-कृपाचार्य व्यवसाय वश
कर्ण दोस्ती – सम्मान वश
कह दे अधर्म के साथ
लेकिन धर्म के साथ
आपका पैमाना यहां कुछ भी हो
हाँ आपका अपना बनाया सजाया
उनकी नज़र में थे वो धर्म के साथ
ओर उन्हें ज्ञात है परिणाम मौत
लेकिन है निज धर्म की बात
युयुत्सु कौरव जा मिलते हैं प्रथमेव
पांडव के साथ
ठीक विभीषण भी हो लेते हैं श्रीराम के साथ
लेकिन युयुत्सु सौतेले भाई जन्मे वेश्या दासी गर्भ सुगंधा
सो रंज नहीं ठीक कश्यप पुत्र बने देव-दानव
असल मे भाई भाई लेकिन सौतेले
वाहक
लेकिन विभीषण तो पुत्र एक ही जमाता
कुम्भकर्ण महाबली सब जानते हुवे रहा अग्रज संग
एक प्रह्लाद देखे धर्म-धर्म विद्रोह पिता विरूद्घ
कृष्ण-दाऊ मारे स्व मामा कंस
धर्म होलिका खुद जले अधर्म नादां नेतिक बचे सलज
युद्धान्त पश्च जानो गांधारी दृष्टांत
मधुसूदन कृष्ण बताते पार्थ को
देख नर तू रो रहा है ले भ्रातृत्व खून
देख बड़ी माँ गांधारी
पेट ही सबसे बड़ा धर्म
हो तो सहज बन संसारी
दैहिक है तू लौकिक है
दैविक बात वसुंधरा पर
अफसोस है नादानी
नर मल उठाये गाय का
गाय चट कर खाये नर का
दोनों है धर्मी
अपना अपना आईना क्या धर्मी विधर्मी
शकूर- मक्खी को भाये मल- कीचड़
वो उसका स्वर्ग
इत्र, मधु ,बाग बगीचा हमारा स्वर्ग
बस ये दुनिया है
जन्म देता मरण देता महिश्वर
एक वो एक ये दोनों धर्म
ओर हम कहते- लेते सहज
क्योकी कोई नहीं विकल्प
उसकि मर्ज़ी उसका न्याय
जन्म मृत्य है धर्म- धर्म..!
NK सेवक “सनातन”