~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

सुकू नही दोस्ती में सनातन

” सुकू नही दोस्ती में क्यों सनातन ”

वो दौर अलग माहोल में जहर था
मगर जहन में बिलकुल न था
दोस्त थे कुछ दुश्मन भी
मगर सच्चाई का दौर था
दोस्ती भी खरी होती थी
और दुश्मनी भी सच्ची
निर्दोष मन मष्तिष्क
कही कोई खोट न था
संसारीकता कि सच्चाई से दूर
वो दौर कुछ ख़ास था
दोस्ती में दम था दिलो में मन था
अह अब दोस्त हैं लेकिन
लेकिन दो प्रकार ओपचारिक अनोपचारिक
मिलता हु उनसे लेकिन सच
वो सुकू नही मिलता
दोस्त कहने की विवशता है
मगर सच कडवा कडवा है
दोस्ताना वो जो होना चाहिए
अफ़सोस किसी में नही दिखता
पारिवारिक सांस्कृतिक व्यावसाइक
अह रिश्ता मित्रता नही होता
मै खिलाऊ तो भी खिलाये
मै बुलाऊ तो तू भी बुलाये
मेने तुजे खिलाया कितनी बार
पैसा उधार मागा चुकाया समयसार
हां पूरा हिसाब रखते और गिनते गिनाते
मै तकलीफ में कभी हाल ही न पूछने आवे
गाहे बगाहे कही राह में मिल जाए
तो पहले ही लाचार बेचारा बताये
ये सोच की कही मदद न मांग जाए
तू समर्थ लेकिन अपने को तंग अपांग जतावे
और पहले से ही मुहमोड़े कन्नी काटे
अरे यार छीजे मत चिढ़े मत बहाने मत बना
मै तेरी मेरी सबकी बात कर रहा हु
दोस्ती का भरम पालना नही
दोस्त दुनिया में कोई हो नही सकता
वक्त ही दोस्त होता है
वक्त ही सोतेला दुश्मन
दोस्ती का ज्वर या ज्वार वक्त के साथ चढ़ता है
और वक्त के साथ उतरता है
दाम्पत्य सांसारिकता का भीं यही आइना
कभी चंद्रमुखी तो कभी ज्वालामुखी
स्त्री और पुरुष का कुछ ऐसा ही फलसफा है ।।

**nk सनातन