ज़ल रहे हैं !!!!!!!

ज़ल रहे हैं !!!!!!!

मै जल रहा हूँ ,लोग ज़ल रहे है सत्ता के गलियारे में देश ज़ल रहे हैं।
शान्ति अमन चैन के मुखड़े मूक देख दर्शक सहाय पर असहाय देख रहे हैं।।
हथियार चल रहे हैं जिन निर्दोष मर रहे हैं,संधियों समझोतो के सुर बिखर रहे हैं।
वो मार रहे हैं हम मर रहे हैं जिम्मेदारियां किताबों में मखोल उड़ रहे हैं।।
राज अपना कायम रूतबा रहे सोच चल रहे हैं कानूनों की आड़ तले नेताओं की माथ तले सिस्टम पिल रहे हैं
ये क्या हो रहा क्यों हो रहा सब पिआसु जिज्ञासु पूछ रहे हैं
सब मिली भगत कानून सब के दूजे दुसरे के दुसरे स्वार्थ के फंडे
क्या ख़ाक अमन ओ चैन के गडेगे झंडे
जो ज्वलंत चल रहे हैं मुद्दे अगर नियत सरे जहाँ की इकसी
दावा तब “सनातन” तुम भी खिल रहे हो हम भी खिल रहे हैं हम सब ही खिल रहे हैं
गर ऐसा असंभव मगर हुवा तो “सनातन”
खिलेंगे चहूँ तरफ बस फुल ही फुल महकते हुवे
ताज़ा हम ताज़ा सांस हमारी स्वस्थ सुंदर खुशहाल
मानों हम सिर्फ हंस रहे हैं
यु तो जी रहे हैं
मगर सही मायनों में हम फिर जी रहे हैं
**nk sevak “सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

Leave a Comment

Keep reading

You may also like