~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

हर प्राणी इस नश्वर दुनिया मे एक अपरिचित के वहां आता है और प्रारंभ से

अपरिचित दुनिया के मोह का राज

हर प्राणी इस नश्वर दुनिया मे एक अपरिचित के वहां आता है और प्रारंभ से ही अपना हो जाता है जैसे उसका उनके संग कोई पहले से ही नाता है । हर कोई सुहानी मनोरंजक दैहिक दैविक प्रक्रिया से आता है और उसका पदार्पण बड़े कष्ट एवं पीड़ादायक प्रक्रिया से होता है ।यानी हर मनोरंजन, अनुरंजन का परिणाम कष्ट,पीड़ा,दुःख ही है । जच्चा-बच्चा दोनोँ ही पीड़ामय प्रक्रिया से गुजरते हुवे एक पहला दूसरा दूसरा जीवन पाता है। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक दौर में मेडीकल सुविधा ,देखरेख एवं इलाज से प्रसव क्रिया सहज एवं आसान हो गयी है लेकिन फिर भी वह समय बड़ा नाज़ुक होता है क्योकि डॉक्टर महज इंसान हैं भगवान नहीं । असहज ओर खतरे की घड़ी में उसके पास दो महान उक्तियाँ हैं- आई एम सॉरी ओर दूसरा प्रे टू गॉड आल इस इन हैंड्स नाउ ! कोई भी संतान दो विपरीत लिंगीय व्यक्तियोँ के आत्मीय ओर शारिरिक इच्छिय क्रीड़ा का परिणाम होती है तो जाहिर है प्रारंभ से ही उसका ओर उनका रिश्ता प्रगाढ़ होता है । रुमानियत लिए पहले दो जिस्मो का प्रेमिल-उत्तेजक मिलन फर्क मातृ-गर्भाशय में दो बीजो या दैविक कणों का मिलन ओर लंबा 9 माहों का विकास प्रक्रिया का आत्मिक,उत्साही ठहराव । इस तरह आत्मीय रिश्ते की अटूटता प्रारंभ से ही व्यवहार एवं प्रभाव में आ जाती है। और ये बंधन परलोकागमन के बाद भी संतान के परलोकगमन ओर उसकी संतति के देवलोकगमन तक संतति दर संतति चलती रहती है पूजा,आस्था,याद,स्मृति आदि प्रकतियों में । ओर निश्चित यूँ तो व्यक्ति मर जाता है लेकिन संतान के रूप में वह जिंदा रहता है और वैज्ञानिक युग की ज्वलन्त खोज डीएनए इसे पुख्ता करती है और एक, दो ,तीन,चार पीढ़ियों तक माता-पिता ,दादा-दादी,
नानाना-नानी के अक्स में उस सन्तति का चेहरा -मोहरा बोलता है !
जीवन और उसकी कहानी अजब-गजब है और दो अपरिचितों के परिचित हो अपना संसार रचने ओर फिर उसने रमने ,बसने की कहानी है । संसार मे व्याप्त मोहपाश इतना प्रबल है कि ढेर दुःखो के बावजूद कोई प्राणी दुनिया नहीं छोड़ना चाहता है । एक ना एक दिन ये दुनिया छोड़नी है और छूटेगी ये एक परोक्ष दुःख का कारण है । ईश्वर अलौकिक महाशक्ति है ऐसा मानव समाज ने अपनी अवधारणा में पिरोया है और उसी की आराधना-अर्चना-कीर्तन से व्यक्ति अपने को मझबूत रखता है । ईश्वर शक्तिमान है और मनुष्य सिर्फ इसलिए इसे मानता है और सुखी रहने के लिए उसे भजता है। जहां मनुष्य का बस नही है वहां ये कहते कि ये ईश्वर की मर्जी है चाहे-अनचाहे स्वीकारता है क्योकि ओर कोई तोड़ नहीं है !
*nk सनातन

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