गरीबी,पत्नी के उलाहने, द्वारिकापूरी गमन ओर दो दोस्तों का बरसो बाद मिलन
भार्या के उलाहने सुन- सुन सुदामा तंग आ गए थे क्योकि जीवन दूभर घर मे दयनीय गरीबी के राज थे
दो वक्त की छोडो एक वक्त की रोटी के भी थे फाँके (वांदे)
टूटी फूटी मढ़ैया या झोपडी कोई देखे तो लजाते
एक दिन सुदामा सहचरी बड़ी गुस्साई
बड़े कहते हो कृष्ण मेरे बाल सखाई
कभी न पूछी यार की हाल-चाल फाँकाई
जबकि वो द्वारकापुरी के नृपराज शाही
चलो वो तो चक्रवर्ती बड़े व्यस्त
तो आप ही चले जाओ न हाल चाल पूछने की गरीबी हो अस्त
देख कर ही वो समझ जायेंगे हमारा दरिद्र
सुदामा बड़े स्वभिमानी विप्र गुमानी नही कद्र
कैसे जाए मित्र के घर वो भी मांगने
ओर वो भी टूटे -फ़टे हाल ज्यो कंकाला
फिर भेंट -शेट् को दिए ला मांग पड़ोस से तीन मुट्ठी सत्तू चावल प्रसादा
चलो कोई चारा नही था
पत्नी के आगे हर पति का यही आईना
सो चले सुदामा ले सत्तू की पोटली द्वारिका
पूछते -पुछाते, भटकते- चटकते बढ़ते गए ले गन्तव्य धाम द्वारिका
आखिर स्वर्ण महल के स्वर्णिम प्रवेश द्वार पहुँचे विपन्न सुदामा
विशाल स्वर्णमढ़ित दरवाजे, विकराल मुच्छड़ प्रहरी खड़े मुस्तेद
कांपते-डरते कहा जर्जर ब्राह्मण ने ओ प्रहरीसेन
की की मुझे कृष्ण से मिलना है
द्वारपाल पूछे भई तुम कौन
उसने कहा बड़े फ़क्र से मैं बालसखा कृष्ण का कहो सुदामा
सुनते ही हँसी-ठिठोली उपहास परिहास खिल्ली व्यंग्य बाण कोसे प्रहरी
तुम ओर महाराज-
अधिराज श्री कृष्ण के लड़कपन यार
देखा है खुद को कभी आईने में कहाँ वो राजा-महाराजा कहाँ तुम्हारी औकात
सुन सुदामा बड़े अकुलाए, कचोटा मन ही मन पत्नी सुशीला की क्यो यहां पहुंचाए
बहुत अनुनय विनय की बस एक बार जा के कह तो देखो मेरे राजे
अगर वो कहते हैं कि नहीं जानता तो उल्टे पाँव लौट आऊंगा
पर सुन एक द्वारपाल को कुछ तरस आया
ओर वो पहुँचा कृष्ण जनार्दन सिंघासन बड़ा भरमाया
ओर कहा -‘महाराज एक छिन्न-भिन्न, फटेहाल, लाचार ग़रीबी का पर्याय आया है आपके द्वार
कह रहा है कि आपसे मिलना है बस एक भेंट एक मुलाकात का है सवाल
ओर नाम अपना स बतावत है सुदामा महाराज
सुनते ही नाम भूचाल आ गया पूरे राजकाज
मधुसूदन यू सुध-बुध खोए ओर भागे महल द्वार
अर्धांगिनी रुक्मिणी राजे बड़ी सन्न देखकर ये हाल
वो विवश भागी मदन के पीछे होने को संग
देखा कि त्रिलोकीनाथ रो रो हो रहे अंग भंग
त्रिपुरारी बिलख रहे हैं वो भी फुट-फुट कर
सटा रखा है कसकर सखा सुदामा हो प्रेमविहृल टूटकर
ओर सोने की थाली में पैर धरा अपने सखा के
श्री कृष्ण धो रहे हैं पाँव सुदामा
पैर में पड़े छाले सहला रहे हैं श्री कृष्ण
नैनो की अश्रुधार से ही धूल रहे हैं पैर मित्रं
नीर भी अचरज की चक्षु जल कर रहा काम उसका
सब स्तब्ध है कि यार ये कैसा मेहमान है लगता विशेष
की श्री कृष्ण खुद आये हैं और रो- रो के बुरा हाल है
बड़े मान-सम्मान लवाजमे से महलों में वो लाये जाते हैं
उन्हें राज सिंघासन पर आसन्न दिया जाता है
पूजा आरती वंदन से नवाजा जाता है
तभी श्रीकृष्ण कहते हैं ये काँख में क्या दबा रखा है
देखा एक मैली कुचैली पोटली जिसमे सीके चावल
श्री कृष्ण खोल बड़े मजे से एक मुट्ठी-दो मुट्ठी खाये
ओर उस भेंट में स्वर्ग का स्वाद पाए
तभी भार्या रुक्मणि रोकती की बस महाराज
दो मुट्ठी से दो लोक का राज हुवा सुदामा
कुछ दिन सुदामा रहे शाही मेजबानी बन महंगे मेहमान
ओर जिसलिये भेजा भार्या ना कसौट-कसौट कर
पर कैसे करे बया दुःख अपने सखा को
बस वो बिन कहे ही लौटते हैं घर को वापस
कृष्ण बड़े हंस रहे मन ही मन
की कैसा खुद्दार है यार मेरा
की इतना विपन्न आया अनमने ढंग ले प्रयोजन
जा रहा है बेरंग
लेकिन क्या जब सुदामा पहुँचते हैं अपने गांव
वहां न उनकी झोपड़ी न पत्नी के नाम ओ निशान
है तो वहां बड़ा विशाल स्वर्ण महल
ओर ऊपर झरोखे से एक सुंदर नारी स्वर्ण आभूषणों में मढ़ी -लड़ी
कीमती हीरे-जेवरात से सजी-धजी अति सुंदर सारी लगती परम
वो देख के सुदामा हँस रही है
सुदामा देख उसको पूछते तुम कौन हो
हँस क्यो रही हो
वो कहती मैं अर्धांगिनी सुशीला तुम्हारी
ये सब तुम्हारे सखा श्री कृष्ण जनार्दन की महा माया है
अरे नोकरो-चाकरों ,
सेवादारो चलो महाराजा द्वारकाधीश के परम सखा महाराज सुदामा श्री को उनके राजवास में ले के आते है !
हर्षो उल्लास का वातावरन यहां गोकुल में वहां श्री कृष्ण रुक्मणि संग मंद मंद मुस्काते बतियाते
की सखा मेरा कैसा भोला सच्चा मानुष !
*nk सनातन