खेकड़ा – “बॉक्सिंग डे
आज विक्रम संवत पंचांग का प्रथम दिन यानी दीपावली के अगले दिन नूतन वर्ष का प्रारंभ…..गुजरात और डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र में इसी कैलेंडर के अनुरूप चला जाता है अर्थात तीज-त्यौहार इसी के हिसाब से अनुसरण किया जाता है…….
मेरी पृष्ठभूमि ओर पार्श्व में यही संस्कृति है…. लेकिन उदयपुर में निवसित होने वश शक-विक्रम दोनो कैलेंडर दाएं-बाएं रहते हैं….
तो विक्रम संवत के जाए आज खेकड़ा का पावन दिवस है ….इस रोज़ ग्राम्य संस्कृति के रंग-बंग सारे देहात का पशुधन गाये-बैल गांव के सांकेतिक प्रवेश द्वार जो पूर्व प्रायोजित रूप से सड़क के दोनों ओर काष्ठ के दो खम्बे गाढ़े हुवे होते हैं या दो पेड़ पहले से ही वहां उगाये होते हैं …. वहां क्षेत्र के जनजाति वर्ग के लोग मिलझूल कर मात्र घास-फुस का एक बहुत मोटा ओर विशाल हार बनाते हैं जो शुभ मुहूर्त अनुसार तोरण के रूप में उन पेड़ो या खम्बो पर बड़े उत्साह उमंग जोश पावनता के साथ बांधा जाता है…. जो तोरण हार …तोरण द्वार बन जाता है इस तरह तोरणद्वार गांव के प्रारंभ या सीमांकन का कार्य भी करता है संकेतात्मक रूप से… ये रस्म गाँव के उत्तर और दक्षिण दिशा में स्थान लेती है… गांव के दो तरफ जनजाति निवसित है जो पाड़ा ओर बेड़ी नाम से क्षेत्र को जाना जाता है..
जैसे मेरे ग्राम में राती का पाड़ा ओर राति बेड़ी नाम के दो क्षेत्र हैं तो दोनों मोहल्ले अपने-अपने क्षेत्र में इस पवित कार्य को अंजाम देते हैं ।
आगे क्या होता है…. जी हां सारे ग्राम के गाय-बैल तोरण के आधा किलोमीटर दूर तक इकट्ठा हैं उन्हें हीरा-मोती की तरह सजाया-धजाया जाता है विभिन्न रंगों से आभूषणों से …. ये मधुर वेला शाम को 3-4 बजे के मध्य कार्यान्वित होती है… निश्चित घड़ी पर ढोल-ताशे ,नगाड़े , पूंजी ,मंझिरे बजाए जाते हैं और जनजाति के लोगो के द्वारा लोकनृत्य ओर लीकगीत गाये जाते हैं सारा माहौल प्राकुतिक रूप से धूलधूसरित हो रंगीन हो उठता है…. सभी लोग रंग-बिरंगे नए वस्त्रों में सजे-फबे होते हैं….
ओर सभी के पास पटाख़े होते हैं…. दिवाली है तो पटाख़े होना लाजमी है…. लेकिन विशेषकर ये पटाख़े खुशी उत्साह जोश जाहिर करने के लिए होते हैं…. ओर खासकर उन भागती गायों को उकसाने के लिए होते हैं….
वहाँ ऐसी परम्परा है कि जो गाय प्रथमेव उस तोरण द्वार को पार करेंगी उसके हिसाब से वर्ष कैसा रहेगा यानी
सूखा
हरा
मध्यम
रहेगा
यानी यदि हरे रंग की गाय ने तोरण द्वार की लकीर प्रथम पार की तो पूरा वर्ष हरा-भरा यानी अच्छी बरसात होगी…..
यदि धवल रंग की गौ आगे निकली तो वर्ष मध्यम रहेगा…
ओर यदि गाय श्याम रंग की सीमा पार निकलती है तो वर्ष सूखा रहेगा….
लेकिन वहां भी अप्राकुतिकता दृश्यमान होती है ….. क्या….. की वहाँ उपस्थित दर्शक या लोग किसी तरह काली ,सफेद गाय को तोरण पार करने से रोकते हैं… क्यो…. क्योकि उन्हें या गांव को हर हाल में नीली या हरि ( ये रंग सिर्फ वो ही जानते हैं कि ये नीली ये हरि है क्योंकि मैंने तो आज तक हरी नीली गाय नही देखी लेकिन खेर ये उनका मापन हैं कि ये हरी नीली है ..) ग्राम्य जन सड़क के दोनों ओर हुज़ूम में खड़े हैं एकत्र हैं और वो पटाख़े उन निर्दोषों के पैरों में डालते हैं कि उनकी पसन्द की गाय ही आगे निकले । इस परंपरा को सराहा जाय या कौसा जाय क्योकि किसी भी दृष्टि से ये मानवीय व्यवहार नहीं …. की उन मासूमो के पादो में विस्फोटक डाल कर उन्हें चिढ़ाया- उकसाया जाय… लेकिन मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए इन पशुओ का दोहन करता आया है क्योंकि वह वसुधा का सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान प्राणी हैं जिसने अपने बुद्धि बल से शेर-हाथी जैसे प्राणियों को खिलौना बना दिया है…।
लेकिन पशु आधुनिक युग से पूर्व मानव जाति का मनोरंजन-अनुरंजन करते आये हैं एक मित्र के रूप में….।
आज खेकडे के दिन लोग एक -दूजे के घर मिलने जाते हैं और मिलते वक्त “जमाल सा” कहा जाता है… मिठाई वगेरह परोसी जाती है। आज व्यापार की दृष्टि से सारे प्रतिष्ठांन बन्द रखे जाते हैं। इस प्रकार 5 दिवसीय पर्व का ये आसमानी अंत होता है मुदित ओर उल्लासित रूप से!
*बत्तीस सालों से उदयपुर में जॉब के कारण हूँ और लगभग झीलों के शहर का ही वाशिंदा हो गया हूं और यहाँ की परम्परा में रच-बस गया हूं। और कई वर्षों से इस र रस्माई उत्सव को मिस कर रहा हूँ…. क्या करे पापी पेट का सवाल है …रोजगार यहां मिला तो यही के हो लिए … लेकिन जेहन में आज भी वो तस्वीरें सुमधुर याद के रूप में बसी पड़ी हैं …जो मैंने अनंयतम भाव से उकेरी हैं।
मेरे ग्राम्य जनो को
खुशहाल
हैप्पी खेकड़ा….
सभी मित्रो , शुभचिंतकों को
जमाल सा…
सौंधी ग्राम्य मिट्टी को नमन
पीठ उर्फ पाठनपुर… हमेशा स्वस्थ,स्वच्छ और प्रसन्न रहे।
हाल उदयपुर से
नरेश K सेवक “सनातन”
One of पीठियन्स
*NK सेवक “सनातन”