आग और राख मिलन ऐ आसमाँ !

आग और राख मिलन ऐ आसमाँ !

आग और राख मिलन ऐ आसमा
ये झुक झुक के उठने वाली नज़र
अफ़साना है बया दिल की सुहानी डगर
ये झुक झुक के उठने वाली नज़र
इशारा कर दिया तुमने
बेकरार है हम
इकरार ऐ मोहब्बत उड़ानो में सफ़र
ये झुक…
मोहब्बत जहन में पनाह लेती है
अनायास ही ये मन को हिलोर देती है
ये झुक….
उठती हुक आँखों से बया होती है
पलके उठती है या के झुकती हैं
बया ये सिलसिला कशीशी दो तरफा क्या हसीन फ़ज़ा होती है
ये झुका ….
यू दिल के अंगारों को हवा-2
मिलता है बारूद ऐ समा महोब्बत क्या खूब रोशन होती है
ये झुक……
धुँवा चारों तरफ मीठा ऐ मुखर ओर हवा ऐ आग जल जाती है
झुका झुका के उठती नज़र मोहब्बत बया हो जाती है
ये झुक….
एक दूजे के दिल का ठिकाना क्या रंगीन मकाम बन जाती है
फिर यू छुपी मोहब्बत सरे आम हो जाती है
झुक…
मोहब्बत का उठता धुँवा नज़र कहाँ आता है
ये वो नज़राना है जो हर दिल को बड़ा खूब भाता है
के आग ऐ अंगार रोशनी बहार बन जाती है
झुक….
बस हवा मिली जो उसकी आँखों की के आग जल जाती है
ये रूहानी आग किसी पानी के बस की बात नहीं की यू ही बुझ के बुझ जाती है
झुक..
गर कोशिश करे इसे बुझाने की-2
तो और ओर अधिक जल भड़क जाती है
ये क्या आग कमाल ऐ कुदरती
की जिससे कोई जल कर भी नही जलता
मगर हाल ऐ लैला-मझनु वो आसमान दिल हसरती
झुक ….
ये मोहब्बत आग सिर्फ मिलन की राख से बुझाई जाती है
यू ज़मीनी होकर भी-2 मोहब्बत आसमानी हो जीत जाती है !
झुक…..
*NK सेवक ”सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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