इंग्लैंड के क्रिकेट छोड़ देनी चाहिए!

टेस्ट क्रिकेट में सिर्फ़ सीरीज़ हुई मुकाबला नही!
दो टीम एक ही स्टेडियम एक ही विकेट या एक ही पिच दो बेटिंग क्रीज ,एक समान गेंद , एक समाहन बल्ले ,समान मौसम- वातारण । यानी दोनो ही टीमो के लिए सब समान……..
लेकिन मेजबान जीतता है 3 मैचों में ओर मेहमान एक मैच जीतता है यानी श्रृंखला 3-1 से मेजबान के पक्ष में रहती है। यानी भारत अपने घर में पहला मैच बुरी तरह हारता है और बाकी 2 रा , 3रा ओर 4था टेस्ट विरोधी दल इंग्लैंड को बुरी तरह हरा घरेलू सीरीज़ जीतता है । यानि एक दाग के साथ जबरदस्त जीत। दाग ये की भारत एक मेजबान के बतौर पहला टेस्ट हारा । अब सवाल ये है कि पिच की वजह से मेजबान जीता । पहले मैच में जो विकेट मेहमान को दिया जिसमें मेजबान फ़िसड्डी रहा और क्यूरेटर्स को अन्य मैचो के लिए हमवतनी मैत्रेयी विकेट बनाने की हिदायत दी। और मेजबान ने तीन मैचों में कमाल कर दिया। इन तीन हार वाले मैचों में विपक्षी कप्तान ने टॉस जीता जो हमेशा अहम होता है में पहले बल्लेबाजी चुनी लेकिन किस्मत को भुना नहीं पाए । यानी चुनोतिपूर्ण स्कोर नही बना पाए और मेजबान ने उसी विकट पर उनसे इतर ज्यादा रन बना साबित किया कि ऐसे विकेट पर हमारे गेंदबाज ओर बल्लेबाज ज्यादा कुशल ओर सक्षम थे और मेहमान औसत रहा और तीन मुकाबले निहायत ही एक तरफा रहे यानी मैच तो हुवा पर मैच नहीं हुवा। हार तो किसी एक कि होती है मैच में लेकिन मैच यानी मुकाबला तो दिखे टक्कर दिखे बराबरी दिखे तो मैच का आनन्द वरना ऐसे मैचों के क्या औचित्य। इंग्लैंड ने तीन मैचों में जो प्रदर्शन किया सोचनीय है टेस्ट क्रिकेट ले लिए। जिम्बाब्बे हॉलैंड स्कॉटलैंड केन्या बांग्लादेश जैसी टीमें यदि ऐसा प्रदर्शन करती है तो पचता है क्योंकि नो सिखिया है और अभी पूरी तरह व्यावसायिकता या प्रोफेशनल स्पिरिट ओर हाइट नही आई है इन देशों ने लेकिन इंग्लैंड जो 200 साल से क्रिकेट खेल रहा है और जनक भी है अफ़सोस ऐसा प्रदर्शन करे तो सालता है चुभता है।
टेस्ट मैच पाँच दिवसीय होता है और दर्शक पांच दिनों के लिए टिकिट लेते हैं ऐसे में यदि मैच दो दिन का एक तरफा समाप्त हो जाये तो दर्शक के लिए भरपूर मनोरंजन नहीं होता यानी “पैसा वसूल” नहीं होता है और जो वास्तविक उस ऊंचाई के दर्शक होते हैं वो कोसते हैं ऐसे मैचों ओर प्रतिद्वंद्वी को जो फिसड्डी रहते हैं मुकाबले में । ओर टीवी-मीडिया संचार एजेंसियां अधिकार खरीदती है प्रसारण का उन्हें भी नुकसान होता है। तो फ़िर क्या किया जाय इस संदर्भ में। टीमें कभी कड़ी टक्कर वाली होती हैं कुछ औसत कुछ कमजोर और कुछ बहुत कमझोर । मुकाबला सब चाहते है कोई एक तरफ़ा हारना नही चाहते हैं । अब टीम सामर्थ्य वाली है या औसत दर्जे की ये तो हम उन टीमो के रिकार्ड ओर वर्तमान स्थिति से ही अनुमान लगाते हैं । लेकिन मैदान में सब शून्य से होता है यानी पहले टेस्ट में इंग्लैंड दल के नायक दोहरा शतक जड़ते हैं वही जो रुट 7 पारियों में साधारण प्रदर्शन करते हैं। वर्तमान में दुनिया के अव्वल बल्लेबाजो में एक ओर भारतिय टीम के कप्तान पूरी श्रृंखला में औसत रहते हैं वही सूंदर ओर आश्विन जैसे अविशेषज्ञ बल्लेबाज उच्च दर्जे का प्रदर्शन करते हैं। टीमों की क्षमता पूर्व ओर वर्तमान रिकार्ड द्वारा आंकी जाती है यानी पेपर पर । अब पेपर पर इंग्लैंड सशक्त प्रतिद्वंद्वी नज़र आ रहा था क्योकि 200 साल से क्रिकेट का जनक हो क्रिकेट खेल रहा है जहां पूरी तरह खिलाड़ियों में प्रोफेशनल अप्प्रोच रोपित- जड़ित है ओर ये टीम उपमहाद्वीप में श्री लंका से सीरीज जीत कर आई थी तो कड़ी टक्कर का अनुमान था लेकिन आलोचक सिफ़र हो गए अनुमान में। अब कहाँ वर्तमान का श्री लंका ओर कहाँ भारत! आज श्रीलंकाई टीम के पास क्रिकेट के वो महारथी नहीं- मुरलीधर, जयवर्धने, कुमार संगकारा, अरविंद डिसिल्वा, सनत जयसूर्या, चामुण्डा वास जैसे दिग्गज। वही हाल दो दशक से एक समय की दादा वेस्टइंडीज के हैं। पिछले दो दशकों की बात करे तो वेस्टइंडीज के पास ऐसा कोई सितारा नहीं हुवा जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरे । इस कड़ी में बल्लेबाजी में सिर्फ ब्रायन लारा ओर शिवनारायण चंद्रपाल ओर गेंदबाजी में कर्टली वाल्श-एम्ब्रोस ! यानी दो दशकों से ये टीम सप्लीमेंट रही है कि हां खेल रहे हैं। वो ख़ौफ़ वो रुतबा वो डॉनगिरी सित्तर-अस्सी के दशक में थी वो कहि ओझल हो गयी। यदि दस टेस्ट दर्जे वाली टीमों पर दृष्टिपात करे तो सिर्फ भारत और ऑस्ट्रेलिया टीमें ही मुकाबले की हैं और टेस्ट मानकों पर श्रेष्ठ हैं हालांकि टीम पेन के नेतृत्व वाली ऑस्ट्रेलिया उस दर्जे का प्रदर्शन नहीं कर पाई है जो स्टीव स्मिथ की कप्तानी में रहा था। इन दो टीमें के अलावा न्यूजीलैंड अच्छी टीम है लेकिन शत प्रतिशत विश्वास वाली नही है। दूसरी तरफ पाकिस्तान का भी वो रुतबा नहीं रहा जो इमरान-सरफराज-कादिर-मियादाद-ज़हीर; अकरम-वकार-इंजमाम के दौर में रहा !
दक्षिण अफ्रीका का भी वो डीलडौल नहीं रहा जो क्रोनिए-कर्स्टन-डोनाल्ड-पोलक; ऐ बी डिविलियर्स ओर स्मिथ-गिब्स ! इंग्लैंड बॉथम-विलिस-गोवर-गूच के बाद सिर्फ नाम की टीम रह गयी है। बांग्लादेश -जिम्बाब्वे सप्लीमेंट्री टीमें हैं ! अफगानिस्तान अभी पालने में है ! लेकिन चलो आई सी सी ( ICC ) द्वारा क्रिकेट की मूल प्रकृति टेस्ट मैच को उसी ऊँचे मकाम पर रखने के लिए जो टेस्ट चैंपियनशिप का दौर चलाया जो पिछले दो-तीन साल से चल रहा था के अंतर्गत भारत ने इस श्रृंखला विजय 3-1 के साथ फाइनल में जगह बना ली है जहां न्यूजीलैंड की केन वीलियम्प्सन एंड कम्पनी का मुकाबला विराट कोहली एंड कम्पनी से होगा । इंशाअल्लाह आई मीन हे भगवन मुकाबला हो सिर्फ मुकाबला हो जैसा कि हमने भारत-इंग्लैंड के मध्य उपमहाद्वीप भारत मे देखा। क्रिकेट के मक्का यानी दुनिया के लब्धप्रतिष्ठत क्रिकेट मैदान लॉर्ड्स में विश्वास की सच्चे ओर भरपुर मनोरंजन के साथ क्रिकेट उस महामुकाबले को देखेगा यानी टेस्ट क्रिकेट की सच्ची ऊंचाइयां देखने मिलेगी किसमे कांटे की टक्कर होगी। जयतु क्रिकेट, जयतु महामनोरंजन !
*nk सेवक “सनातन”