उजाले,अंधेरे-उजाले!

उजाले,अंधेरे-उजाले!

★अंधेरे -उजाले ★
शने शने ( धीरे-धीरे ) आसमा दिया,
धीरज रंग लाया और चढ़ाव दिया
लेकिन बहार से खिज़ा का बड़ा साथ रहा
बेरहम किस्मत के खेल ने
बड़ा अन्याय रहा
अचानक अनायास तक़दीर रूठा
ना जाने मुझसे क्या जुर्म हुवा
देखते ही देखते मुझे दर्द पे दर्द मिला
सबके रहते लगा कोई नही है मेरा
थोड़ा संकट या के बुरा समय क्या आया
हाय सबने मुँह मोड़ दिया
उस बुरे दौर ने क्या क्या विषम रूप दिखाया
कही से कोई तोड़ न था
बस जैसे तैसे निबटना ही विकल्प था
ओर उसी जज्बे से जिसका में कामी था
फिर हामी हुवा
ओर समय के साथ आईना फिर बदला
यू झिलमिल-झिलमिल अंधेरा किनारा हुवा
उजालो का साथ जाने फिर मिला
ओर जीवन फिर सहज मोड़ पर आया
लेकिन फिर दौर बदला यकायक
जिसमे एक बार फिर आसमा दिया
अब जीवन सहज के साथ -2
बहुत सुलभ ओर सरल हो गया
उस सर्वेश्वर के ज़ानिब हे किस्मत तेरा शुक्रिया!!!!

★NK सेवक ”सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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