“उथलापन जिन्दगी का !”
“उथलापन जिन्दगी का !”
हर आदमी उपर से खुश नज़र आता है
लेकिन अन्दर से थोथा उखडा खोखला
या तो वो खुद या खुदा जानता है
रंक हो या के रसूख सबका इक आइना है
उसे रोजी रोजगार की चिंता है
उसे पद गरिमा की चिंता है
उसे है खो न जाए की चिंता है
उसे नही है जो आ जाए की चिंता है
कुल मिला कर सबकों अपनी अपनी
और उनकी इनकी चिंता ही चिंता है
हर धरती वासी को चिंता है चीता की
हर हाल में मिटटी धुँवा होना है
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष साए है महायात्रा के
सब जीते हैं जाने अनजाने इस सत्य के बाए
यहाँ हर शख्स अपने रंग अपने राग
सुर बेसुर तालो में वही फीका आलाप
जीवन सगीत का तान पूरा उसका खिलौना है
जाने कब झिन्झोड़ना जाने कब तान देना
हर आदमी यहाँ सिर्फ दर्शक श्रोता है
कब समागम पूरा हो जाय
इक अबूझ मगर बुझ पहेली सा है ।
nk सेवक “सनातन”