कुछ ब्रह्मांडीय विचरण

कुछ ब्रह्मांडीय विचरण

*कुछ ब्रह्मांडीय विचरण*
” मनुष्य जन्म ही धर्म के नाम अधर्म से होता है जिसमे पवित्रता ढूंढना अप्राकृतिक अवधारणा होकर बेईमानी है !” *Nk सनातन
“मनुष्य ने अपने स्थापित मूल्यों से पवित्रता और धार्मिकता आरोपित की जबकि असल दर्पण या मूल्यांकन में व्यक्ति ठेठ अपवित्रताओ से भरा है !” *Nk सनातन
“जब तक मन है ,तन है पवित्रता ,धार्मिकता आंशिक क्षणिक अर्थात स्थाई मुश्किल, असंभव है और मनोवेग सिद्धांत के अंतर्गत यह पुख्ता सत्य है चाहे मानव इसे स्वीकारे ,न स्वीकारे !” *N K सनातन
“मनुष्य की सगुण या द्ववेत अवधारणा या सोच मनुष्य की निकृष्ट सोच को उच्च सोच में प्रकट करता है ;और अवतार वाद को जन्म देता है !” * N K सनातन
“मनुष्य जन्म ही धर्म के नाम अधर्म से होता है जिसमे पवित्रता ढूंढना अप्राकृतिक अवधारणा होकर बेईमानी है ;मनुष्य ने अपने स्थापित मूल्यों से पवित्रता और धार्मिकता आरोपित की जबकि असल दर्पण या मूल्यांकन में व्यक्ति ठेठ अपवित्रताओ से भरा है ! जब तक मन है तन है पवित्रता धार्मिकता आंशिक ,क्षणिक स्थाई मुश्किल असंभव है!
*N K सनातन
” मनुष्य की सगुण या द्ववेत अवधारणा या सोच मनुष्य की निकृष्ट सोच को उच्च सोच में प्रकट करता है और अवतार वाद को जन्म देता है।मनुष्य का अपनी सोच पर पूर्णतः नियंत्रण असंभव है और पांचों इंद्रियों पर कुलांत नियंत्रण दुष्कर है और जो भी व्यक्ति (साधु,संत,आध्यातिक पुरुष) ये दावा करता है शत प्रतिशत झूठ साबित होगा यदि उसे नारको टेस्ट या किसी ऐसी युक्ति से परखा जाय जो मन की वास्तविक सोच को सुक्ष्म रूप से नाप सके जांच सके ! “सनातन’ सोच कड़वी है लेकिन सत्यम होकर परम है।
*Nk सनातन
शिक्षित एवम अशिक्षित दोनो व्यक्ति प्राकतिक रूप से इसी सीमित सृष्टि में आसक्त एवम विवश रहे की ब्रह्माण्ड का विस्तार अनंत है मानव ने अनंत शब्द इसलिए गढ़ा क्योंकि उसकी सोच और क्षमता सीमित ठहरी और उसने रहस्य शब्द का प्रादुर्भाव रच उसकी सोच संकुचित या विराम के चलते अनंत कह कर प्रश्नचिन्ह लगा सोच को समाप्त कर दिया फिर भी मानव प्रयास कर रहा है की इसके आगे क्या की जब धरती का सत्य अंत तो अंत क्या और अंत तो उसके आगे क्यों नही
धरती यानी संसार की रचना पाप के सिद्धांत पर हीं आरोहित है वरना ईश्वर इतना दयालु और महान है तो वह ऐसा धर्म और सिद्धांत क्यों स्थापित करता की ताकतवर शेर मांसाहार पर ही आश्रित हो निरीह मासूम निर्दोष हिरण को मार कर खाता और वही हिरण पेड़ की हरी हरी कोपल और पत्तियां, टहनिया खाता हैं और महान वनस्पति वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु की शोध में पेड़ो,तरुओ को भी दर्द होता है !*Nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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