~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

घर किराए का

★मेरा किराए का घर ( मंचीय हास्य कविता) ★

घर कैसा भी हो अपना-अपना होता है !
है नहीँ मेरा घर
बनाना सबका सपना होता है !
बीबी कैसी भी हो दुसरो की,
देख के सुकूँ मिलता है!
लेकिन घर का क्या,
दुसरो का देख सुकून कहां मिलता है !
हालांकि दोनों में है सिर्फ
देखना ;
पर देखने और देखने दोनोँ मे,
जमी-आसमा का फर्क होता है !
उसको देखने पर बात अंदर तक चली जाती है !
ओर किसी रात सपनो में वो पूरी चली आती है !
कभी नहीं भी आती पूरी, तो खुद की बीबी को ही,
कोई लैला समझ,
उस आनंद को पाना है !
लेकिन घर – “घर का क्या ? “
दुसरो का खुद का समझू भी तो उसमें कहा रह पाता हूँ !
घर अपना शरण स्थली है !
गृहस्थ के काम- धाम, क्षोभ ,व्यायाम,
थकान ,उठापटक से जब घर जाता हूँ !
अपने घर मे स्वर्ग सा सुकुन पाता हूँ
किराए का ही सही पर अस्थाई अपना होता है
जो सारे इंतजामातो
से सजा-भरा पड़ा है !
लेकिन उसमें सुख मिलता है पर क्षणिक
क्योकि उसमें पराए पन का अहसास जो होता है !
बीबी दुसरो की हो तो भी, क्या बात है प्रकुति में ही,
हा बस अपना सा ,सुहाना सा अहसास होता है !
क्यो ……?
है ये इक पीएचडी या रिसर्च का विषय !
कोई शोधार्थी चाहे तो आनंद पा सकता है !
भारतीय पत्नियो से अगर
पतियों के बारे में पूछा जाए तो
वो बताना तो बहुत चाहती हैं पर मझबूरी जो होती हैं
संस्कृति भारतीय परम्परा जो ऐसी है
हां अंतरंग सखी -सहेलियों से सब साझा या चर्चा करती हैं
कुछ ऊपर की कुछ अंदर की
बड़े चाव से बया करती है
ओर अरे यार तेरे वो ओर मेरे वो
में क्या खूब हँसी-ठिठोली होती है
किसी की बीबी ईर्ष्या का विषय नहीँ होता
लेकिन घर जरूर ईर्ष्या का विषय होता है
क्योकि सब बीबियों का ऊपरी फ्रेम अलग हो सकता
बाकी ढांचा अंदर-बाहर सब इक जैसा हँसीन !
वैसे भी स्त्री के बारे दर्शन, मनोविज्ञान सर्वविदित,
चेहरे पर रुमाल डालो सब मधुबाला !
पर घर के ढांचे
अंदरूनी -बाहरी,
अलग -अलग होते हैं !
डाले कैसे रुमाल ऊपर
ओर कैसे समझ ले
आशिया मेरा है वैजयंती माला !!
*nk सनातन