चाह ओर प्रेम का आईना

चाह ओर प्रेम का आईना

“प्रेम और चाहत”
प्यार क्या है भावनाओं का ज्वार है
अनंत आकाश की गहराईयों का दरिया है
चाहत प्यार नही भावनाओ का उबाल है
प्यार समर्पण जबकि चाहत भोतिक आवेग
प्यार एक अर्पण जबकि चाहत एक तर्पण
प्यार दैविक प्राकतिक रूपक दीपक
चाहत यानी कमी और कमी पुरी नही तो खलती
प्यार शिकायत नही करता चाहत करती है
प्यार सहता है चाहत आवेशित होती है
यदि उपेक्षित हो चाहत तो प्रतिकार करती है
चाहत ही सभी हिंसा -प्रतिहिंसा का नाम
इसी से सारी व्याधियां पनपती है फूटती हैं
प्यार खुदा की इबादत इसमे बस पूजा ही पूजा
प्रेमी रूठ जाए टूट जाए तो तो टूट कर मनाता है प्यार
किसी भी हद से गुजर जाता है हमदम हमराह हो दिलदार
प्यार महसूस हो सकने वाला दिली अहसास
जबकि चाहत भोतिक या शारीरिक संवेग
लेकिन प्यार का अंत कामनाओं या चाहतो पर खत्म होता है
क्यो की प्यार फूटता तो अंतःकरण से
लेकिन क्योकि ये शरीर के मस्तिष्क का ज्वार
जो मानसिक स्फुरण से शारिरिक जरूरतों पर मचलता
ओर कामनाये जब घर कर जाती
प्यार नदारद
प्यार के नाम चाहते हिलोर मारती हैं
ओर सारी हदों को तोड़ किनारे तोड़ जाती है
ओर चाहत वासनामयि हो गरल हो जाती है
ओर ऐसे में यौवन के उबाल तक ये किल्लोल करती है
ओर शारीरिक क्षीणता के बाद भौतिकता मरती जाती है
ओर फिर रह जाता है बस प्यार
प्यार की कोई उम्र नही मगर चाहत की निश्चित उम्र होती है
“सनातन” प्यार खरीदा नही जाता
प्यार अपुर्ण ओर जो पूरा हो वो प्यार नही
चाहते बाजार से पूरी हो सकती ह “सनातन”
प्यार खुदाई उसमे होती है रुबाई
चाहत मन की लालसा ओर लालसा का मन से नही
बस तन से बस तन से ही वास्ता।।
*NK सेवक “सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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