*प्रतीकात्मक तिरंगों का निस्तारण*
किसी मनीषी चिंतक देशभक्त ने
हां अपने चिन्तन में व्यथा प्रकट की
ओर उस शख्स की टीस शिकवा
जायज की,
की आज 15 अगस्त ओर देशभक्ति उमड़ी है
ओर चारो तरफ तिरंगे लहलहा रहे हैं
कही कागज कहि कपड़े कहि प्लास्टिक के
ओर एक रोज के बाद हश्र उनका
क्या
वही रद्दी की टोकरी में या सड़क पर अधमरे मूर्छित
हां गद ले फ़टे टूटे बिखरे छोटे मोटे तिरंगे
आखिर देशभक्त क्यो नही निस्तारण करते आदर पूर्वक
की वो शान देश की सड़क गली कूँचे
जहाँ-तहां यहां वहाँ बिखरे पड़े मिले
अगर हैं ये तिरंगे के प्रतीक तो आदर से हो इसका हो निस्तारण
क्यो न “सनातन” की पेशकश पर विचार किया जाय
जिस तरह देवी-देवताओं और ताजियों का
हां निस्तारण एक पावन रस्म से होता है जल विसर्जन से
क्यो न फरमान ऐ ऐलान से की सारे तिरंगे प्रतीकात्मक
हां अगले रोज एक जगह इकट्ठे किये जायें
हां नगरपालिका की टीम द्वारा ओर स्वेच्छाचारी कर्मियों द्वारा
अगर ऐसा हो जाय “सनातन”
तो जो देशभक्ति सड़क पर ओर अपमान की
हां अपमान की बात हवा हो जाय
ओर हमारी राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि ओर गौरवमयी हो जाये
लेकिन जब राष्ट्रभक्ति खास से आम होती है
तो अच्छा लगता बहुत अच्छा लगता है
झंडे सड़क पर नजर आते हैं ये अपमान नही
ये मान ही था कि मौके पर उसे दर्शाया फहराया
ओर हर वस्तु की यही सूरत मिटना
इंसान भी कितना बड़ा मिट्टी में ही मिलाया जाता है
खादी बड़ी महंगी क्योकि वो खास लोगो का पहनावा
पोशाक सिर्फ बड़े नेताओं की
ओर तिरंगा खादी का ही मान्य
वो भी नाप का
बड़ा महंगा
हर आम व्यक्ति की नही हैसियत
की वो उसे जहाँ तहाँ फहराए
*ओर “सनातन”की इस बात से न रखे इत्तफाक
तो मेरे देश वासियों की एक नब्ज मैं जानता हूं
की एक रुपिया भी पडा हो हो चाहे कैसा भी रसूख
बड़ी तबीयत से तपाक से उठा लेता है
तो “सनातन” इस तर्ज पर तिरंगा
खादी का नही
सिर्फ सोने या चांदी का हो
“सनातन” का दावा तब तिरंगे सड़को पर हरगिज़ न नजर आएंगे
ओर ससम्मान रखे जाएंगे और
सुनार भी उसे न खरीद सके ऐसा प्रावधान हो
फिर तिरंगे ता -जीवन नही
पीढ़ी दर पीढ़ी वही मिलेंगे
ओर समय समय पर पोलिश भी होगी।
*nk सेवक “सनातन”