■ ज़ख्म ओर नासूर ■
जख्म दो प्रकार के
एक तन एक मन
नासूर भी प्रकार दो
तन के घाव नासूर
भर जाते हैं देर-सवेर
हां महान वक्त के साये
लेकिन हाय जख्म तन के रहते
हां दर्दी -बेदर्दी हरे-ताजे
हां हरदम ताजे-हरे
क्या खूब पानी पिलाया है
बेरहम माली ऐ वक्त -किस्मत
हवा धूप खाद भी उन्नत
की मजाल है जख्म की पौध सुख जाए
यही हाल बेमुरव्वत नासूर के भी
की लाइलाज है इंतज़ार सिर्फ इलाज ऐ मौत
जख्म देर सवेर भरते हैं
मन के शरीर के
ओर नासूर लाइलाज सिर्फ जलते हैं या के दफ़न होते हैं लाश के साथ !
*NK सनातन