दो रूहों की प्यास !

दो रूहों की प्यास !

मिले हम तुम बड़े नसीबों से
प्यार परवान चढ़ा पर आसमा न मिला
की बिछड़े हम बिगड़े नसीबो से
दौर वो फूलो सा सुगंध ही सुगंध
चहचहाहट की चारो तरफ चमन ही चमन बसंत ही बसंत
सुगंध हमने ली जिस्मानी बहार में
की यकायक सितम आया
भंवर में डाला यूं कहे की जिंदा मार डाला
लेकिन किस्मत की लकीरों का यही सिला
हमने तुमने जमाने की माना
लेकिन आज फिर मिले है नसीबो से
जिस्म की प्यास न रही तब अब प्यास है दो निर्दोष रूहों की
आ बुझा ले सिमट की बाहों में
बाहों से धनी कोई संसार नहीं
अधर को धर ले अधर से फिर
इससे बढ़ कर कोई स्वर्ग का जहां नहीं
जिस्मों की प्यास सीमित है
रूहों की प्यास कभी बुझती नही
हर जनम में हो साथ पूरा
रूहों की प्यास तब आसमा होती है
अनंत असीमित नाम तब
अमर अबूझ आग तब जलती ही रहती है
*N K सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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