कल रघुराम राजन ने अपने रेगुलर ब्लॉग (देनिक भास्कर) में इक घटना का जिक्र किया शीर्षक था–“अंग्रेजी अपने आप में कोई ज्ञान नही भाषा हैं” ।घटना गुलाबी नगर और राज्य राज्स्थान के इक मिडिल लेवल के होटल की जिसमे लांड्री का बिल हाउस कीपिंग स्टाफ द्वारा गलत दिया जाता है जबकि सामान यानी कपडे उसी आदमी के थे पर बिल उसका नही था लेकिन नाम उसी आदमी का था । और ऐसा रोज 20-30 केसों में होता था क्योकि वहा का स्टाफ written अंग्रेजी में परफेक्ट नही था। हालाकि डेली रूटीन में आने वाली काम चलाऊ अंग्रेजी स्टाफ बोल लेता था और आगे वाले कस्टमर को समझ आ जाता था। जहा तक समझ की बात है तो इक अनपढ़ या गूंगा बहरा भी इशारों में समजा देता है। लेकिन यहाँ बात भाषा की निपुणता को लेकर है। ऐसी कई होटले ,व्यावसाइक संस्थाने और यहाँ तक की कई प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाए जहा अंग्रेजी का दम तो भरा जाता है लेकिन वहा अंग्रेजी जाननेवाले लोगो की कमी है। कमी क्यों है क्योकि वो संस्थाए अच्छी सेलेरी देना नही चाहती। सिर्फ ड्रेस कोड टाई शूट से अंग्रेजी नही आती। लेकिन दिखावा बहुत होता है। खेर दुकानों होटलों फर्मो मालो ऑफिसो में केवल विजिटर आते है या कस्टमर्स और वहा केवल अंडरस्टैंडिंग काफी होती है टेक्लिंग काफी हैं लेकिन शिक्षालय जिन्होंने अंग्रेजी माध्यम के स्वांग रचे है और लोग भी भ्रम में जीते हैं । वो ये नही जानते की किस स्कुल में अंग्रेजी माध्यम वाले ओर अंग्रेजी जानने वाले कितने अध्यापक हैं । आप अपने विषय के विशेषग्य हो सकते हैं निष्णात हो सकते हैं पर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना सम्जाना विषय की गहराई में जाना,विद्यार्थी के प्रश्नों का जवाब देना उन्हें संतुष्ट करना इक नॉन english शिक्षक के लिए इतना आसा नहीं हां आप काम चला सकते हैं या आम भाषा में धका सकते हैं । अभिभावक भी इतनी अंग्रेजी नही जानते और ढोल में पोल चलता है और कई स्कुलो के प्रसाशक भी अंग्रेजी नही जानते लेकिन चलता है क्योकी कोई अंग्रेजी बोलने वाले पेरेंट्स आते ही नही और आये तो बोले अंग्रेजी तब प्रशा सक की हवाइया उड़ सकती हैं ऐसे में उसे अपनी कमजोरी स्वीकारते हुवे सिट छोडनी पड सकती है। कुल मिला कर अंग्रेजी भारत में आज भी होव्वा है । आप एमएससी ऍम कॉम ऍम ए पीएचडी हो सकते हैं डोक्टर इंजिनियर हो सकते हैं यहाँ तक की आईएस आइपीए प्रोफेसर लेकिन अंग्रेजी में पारंगत होना प्रवीण होना अलग बात है । ऐसे कई बन्दे हैं जो हाई क्वालिफाइड हैं पर उनका अंग्रेजी ज्ञान दुरस्त नही। ऐसे शिक्षण संस्थाओं के जमीर मर गए हैं और वो धका रहे हैं क्योकि उन्हें पता है पढने वाला आखिर बच्चा ही तो हैं एडजस्ट किया जा सकता है फिर पास बुक्स कुंजिया हैं सपोर्ट के लिए और अंग्रेजी माध्यम स्चूलो में बस रट्टा पद्धति ही तो चलती है । जिन स्कुलो में अंग्रेजी जान्ने वाले और अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले कुशल अध्यापक हैं वहा इक आम पेरेंट्स फीस वहन नही कर सकता फिर वहा उचे %पर ही एडमिशन होते हैं इसलिए पेरेंट्स धकाने वाली स्कुलो में जाते हैं और बाद में पछताते हैं। इक स्चूल में इक अध्यापक अंग्रेजी पढ़ा रहे थे तो सही नही पढ़ा रहे थे यानी धका रहे थे तभी उनके ऑफिसर आये और टोका की आप गलत केसे पढ़ा रहे हैं शिक्षक ने जवाब दिया 800 रुपियो में तो ऐसी ही अंग्रेजी पढ़ाने वाले मिलेंगे साब। कुल मिला कर ये स्तिथि खतरनाक है और सरकार और राज्य के शिक्षा मंत्री देश के मानव संसाधन मंत्री इस पर संज्ञान ले और ऐसे स्कुल जो अंग्रेजी माध्यम से चल रहे हैं उनके पुरे नोर्म्स की अध्यापक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा रहे हैं वाकई अंग्रेजी जानते हैं । उनका माध्यम नही रहना मायने नही रखता अंग्रेजी जानना अहम् मुद्दा होना चाहिए। क्या वो बच्चो के भविष्य के साथ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष खिलवाड़ कर रहे हैं। sevak Nk सनातन की पेनी धार से