~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

शीत हो या उष्ण मेरी आवाज पे तुम चली आना

शीत हो या उष्ण मेरी आवाज़ पे तुम चली आना
( होली महापर्व पर मेरे जज्बात मेरे अपने देशजनों के नाम)

जब रुक जाए नफरतों की बयार
जब रुक जाए हिंसा की आंधी ओर खार
जब थम जाए प्रति हिंसा की नीयत
जब रुक जाए काला सियासी खेल ओर फ़जीहत
तुम चले आना होली खेलने (1)

जब छा जाय शांति चहू ओर और न हो रणनीति
जब बन्द कर दे अपने अपनो से कूटनीति
जब संतुलित हो जाय महंगाई देश मे
जब मीट जाए बेरोजगारी भुखमरी देश मे
तुम चले आना होली खेलने (2)

जब रुक जाए धोखा, फरेब, मक्कारी, धूर्तता
जब मिट जाए, पाट दिए जाय सारे स्वार्थ ओर अ-हल
जब सारा देश उच्च शिक्षित पा ले नैतिक उन्नति सवर्दा
जब मिट जाए ऊंच-नीच का भेद हर खेल
जब मिट जाए जात-पात ,धर्म के भेद
ओर स्थापित हो जाय असल समता के रंग शून्य सारे छेद
तब तुम चले आना होली खेलने (3)

जब हो जाए सामाजिक,आर्थिक संतुलन
जब बस जाय राधा-किशन सा निश्छल प्रेम
जब छा जाए भाईचारा समूचे विश्व-देश
जब खत्म हो जाय धार्मिक उन्माद-आतंक वाद
तब तुम चले आना दौड़े-दौड़े होरी खेलने निर्विवाद (4)

जब ना हो देश मे तलाक ओर शादियों में फिजूल खर्च ऐश में
जब बराबर हो जाय लिंगानुपात देश में
जब बन्द हो जाय लूट, हत्या,चोरी बलात
पा जाए देश,समाज और परिवेश सब टंटो से निजात
तब तुम चले आना होली खेलने (5)

जब छा जाए स्वच्छता और हो पर्यावरण संतुलित
प्राकुतिक पर्यावरण मानसिक दूषण का भूषण
जब मानसिकता दुरस्त हो जाये
जब बन्द हो जाय गुरु द्वारा अंगूठा मांगने का रिवाज़
तब तुम चले आना हौली खेलने (6)

जब बन्द हो जाय सारे निजी कोचिंग, शिक्षण ओर चिकित्सा संस्थान
हां हैं बाज़ार, व्यापार और व्यवसाय के घर
नहीं रहा उनका वो खुदाई जमीर जो करते जिंदगियों से खिलवाड़
जब हो जाय ईमानदार तो
तो चले आना देशजनों हौली खेलना (7)

धर्म के नाम जब बन्द हो जाय रावणो द्वारा अबलाओ का अपहरण
भरी सभा मे सूरमाओं के होते रुक जाऐ चीर हरण
जब मर जाये कंस,दुर्योधन, हिरण्यकश्यप
तब तुम चले आना होली खेलने(8)

जब बंद हो जाय सीताओ की अग्नि परीक्षा
जब स्वयं श्री कृष्ण न आए गरीब सुदामा की सुध लेने
जब निर्दोष प्रह्लाद न बैठाए जाय जलाने होलिका द्वारा
जब न रहे देश मे धोबी कोसने को पाक चरित्र
तब तुम चले आना लपक के मेरे
होली खेलने(9)

रंग सारे फीके पड़ गए हैं चाहे हो रिश्ते-दोस्ती -नाते या देशभक्ति
जब ये गहरा जाए रंग बसन्ती- संग बसंती ,मन बसंती
तुम तुम तुम सब चले चले आना आंगन मेरे
या बुला लेना मुझे होली खेलने(10)

जब भौतिकता की सोच मिट जाए
सब दौर ऐ आज अस्त है व्यस्त हैं पस्त है
जब बस जाए जहन में मानसिक -आध्यात्मिक -पारिवारिक शान्ति
तब तुम चले आना ,चले आना ले के मन का रंग
हाँ होरी हां होली रंगोली धुलंडी खेलने।(11)

ओर आखरी खास पते की बात
धर्म -नीति-रीति सबकी कोई ना कोई
सब का निचोड़- सार मानवता सच्ची अपना
यानी दुनिया ऐ फानी से उठे तो क्या उठे
बिन धर्म बिन भलमनसाहत, भलमनसाई
यानी सच्चे धर्म पर जब सब चल पड़े हाँ जब चल जाये
हाँ तब हाँ तब तुम चले आना होली खेलने(12)

“सनातन ” जीवन आखिर होता ही है कितना
पचास-पचहत्तर या फ़ीर सौ फिर फिर बिखेरते क्यो -2 हम श्याह रंग
पश्चिम की तर्ज लाल खतरे का चिन्ह
पूरब तहजीब ऐ जन्नत लाल या सुर्ख
अहा शुभ शुभंकर अच्छे सच्चे का प्रतीक
हो जाय हर जगह लाल या लाल या केशरिया ओर श्वेत ओर हरित
तब तब प्रिये तुम चले आना -2
होली के लिए वो खुशहाली के रंग।(13)

जब सबके ही हो उस रोज़ श्वेत वस्त्र
और हो सबके ही पास सारे लाल-पीले रंग बिना अस्त्र
और हो इकट्ठा सब एक ही जगह वो भी सार्वजनिक
तब न तुम्हे आने की जरूरत न मुझे या किसी को
बस हैं सब एक ही जगह सबके मन की
ओर बजे ढोल-ताशे ,चंग-मृदंग ओर बाजे
और ओर हो नाच-गाने साथ मे महाशिवर प्रसाद
ओर उमंग,उत्साह, मस्ती ,खुशियों के साज
और होली खेलने ओर मिलन का हो वो स्वर्गिक अहसास
तब स्वर आसमानी होगा अच्छा माने -होली है !! (14)

*nk सेवक “सनातन”
उदयपुर(राजस्थान)