*मताधिकार : उम्र और शिक्षा के परिप्रेक्ष्य में *
कालम – पटाक्षेप या विचार-विमर्श ( नाम से हो इस आर्टिकल के लिए)
*युवा होने की उम्र दुनिया के देशों में अलग -अलग है यानी किसी देश मे चौदह वर्ष तो कही सोलह वर्ष कहीँ अठारह तो कहीँ इक्कीस , इस तरह मनोवैज्ञानिक सोच के साये में आधुनिक चश्मों के चक्षुओं में वयस्क होने की उम्र में कमतरी आती जा रही है। अर्थात वयस्क होने के जुदा-जुदा उम्र के पैमाने। वो इसलिए कि समाज की सोच और व्यवहार का आईना और ग्राफ बदला है। इसका कारण अद्यतन तकनीकि विकास जिसमे इंटरनेट और मोबाईल क्रांति का दौर पुख्ता सबब का हिस्सा हैं। मोबाइल और कंप्यूटर के दौर में नव पीढ़ी की सोच-समझ बढ़ी है इसमें कोई संदेह नहीं और वह साधारणतः उन सब बातों से भिज्ञ है जो एक पूर्ण वयस्क व्यक्ति जानता है। बात हो रही है मताधिकार जिसमें उम्र और शिक्षा की भूमिका महत्व रखती है जिस पर कई मनीषियों ने विमर्श किया है जिस पर मैं कुछ विचारणीय बिन्दु रख रहा हूँ वो ये की प्रत्येक देश मे मताधिकार की उम्र भिन्न-भिन्न है । हमारे देश मे इसकी सीमा 18 वर्ष है और आने वाले कल में 16 या 14 भी कर दी जाए तो आश्चर्य नहीँ। कुछ वर्ष पूर्व ये इक्कीस थी । इस कड़ी में वयस्क होने की उम्र स्त्री 18 लेकिन पुरुष 21 तो ये बहस का मुद्दा है कि औषधीय विज्ञान के मापन से शारिरिक रूप से स्त्री 18 वर्ष में जवान हो उठती है जबकि नर 21 अर्थात शारीरिक रूप से 3 वर्षों का बड़ा अंतर तो सवाल ये उठता है कि मानसिक और बौद्धिक रूप से दोनों मादा-नर किस उम्र में समझदार हो जाते हैं। क्या दोनों समान रूप से 18 की वय में मानसिक रूप से समझदार हो जाते हैं जबकि विवाह के परिप्रेक्ष्य में शारिरिक मापदंडों को ध्यान में रखा है और 18-21 को तरजीह दी है।18 वर्ष की वय में उन्हें देश के लिए अहम सरकार को चुनने का हक दे दिया गया है। यदि ऐसा है तो शारीरिक मापदंड क्यों जिसमे भेद रखा गया है, विवाद के उम्र में, जब व्यक्ति मानसिक रूप से समझदार हो गया है तो विवाह की उम्र में भेद के क्या मायने। जब वयस्कता की उम्र कुछ देशों में 14 कुछ में 16 तो ऐसे मापदंड के क्या मायने ! वो तो गनीमत है कि इसके लिए कोई जन आंदोलन के लिए उद्धत और प्रेरित या उतारू नहीं हुवा अब तक वरना विश्व में समान रूप से मानवीय अधिकार प्राप्त करने के लिए ये कदम भी मानवतावादी युवा संगठन उठा सकते हैं।
मताधिकार की उम्र 21 से 18 करने के पीछे रही धारणा में एक ये रही है कि अधिक से अधिक युवा वर्ग देश की सरकार को चुनने में अपनी भूमिका निभाये।इस भावना में काश सोचा गया होता कि युवा वर्ग जिसे मत दे रहा है उसके बारे में मत देने में उसकी सोच परिपक्व है या नहीं। निश्चित मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाय या दर्शन के रूप में, व्यक्ति के परिपक्व होने में उम्र का तकाजा महत्व रखता है। उम्र व्यक्ति को निसंदेह परिपक्व व समझदार बनाती है। तो सवाल यह की परिपक्वता की कमसे कम उम्र क्या होनी चाहिए। ये कम से कम 30 होनी चाहिए क्योंकि 30 के सम व्यक्ति कई थपेड़े खा चुका होता है और उसे अच्छे बुरे ओर कड़वे मीठे का आंशिक अनुभव हो चुका होता है और जिंदगी के बारे में वो उचित ओर कारगर निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है। तो वो देश की सरकार चुनने के लिए सही -सही मतदान करने में भी सक्षम है, ऐसा तय है।
आज की पीढ़ी इंटरनेट, कम्प्यूटर ओर मोबाइल क्रांति से ज्ञान के क्षेत्र में आंग्ल भाषा का शब्द ले तो पूरा न्याय करता है वो ये की “एडवांस” हो गयी है लेकिन
क्या समझ और निर्णय के दृष्टिकोण से भी वह इतनी ही “एडवांस” हो गयी है, तर्क और परीक्षण का विषय है। आज की नव आधुनिक पीढ़ी तकनीकी रूप से समझदार, कुशल ओर तर्कशील हुई है लेकिन सोच, निर्णय ओर विवेक से परिपक्व हुई है, कहना उचित न होगा या उचित है कहना जल्दबाजी होगी।आदमी कितनी ही तरक्की करले लेकिन जैविक परिवर्तन में सदियां लगती हैं। 30 कि उम्र तक व्यक्ति जीवन के उतार-चढ़ावों से दो-चार हो ही जाता है । उसे जीवन की आहों ओर वाहों से सामना हो ही जाता है , तो मतदान की पूर्व परिपक्वता उम्र 30 मानी जा सकती है और इसके बाद व्यक्ति कदम दर कदम उम्र दर उम्र पकता ही जाता है ,मंझता ही जाता है। उसमें तज़ुर्बे के क्षार ओर चाशनी में डूबना आ जाता है और जीवन का गाम्भीर्य बढ़ता जाता है। और वह हर पल सजग हो उठता है। सो मताधिकार की कम-से कम और अधिकतम उम्र निर्धारित की जानी चाहिए, जिसमें उम्रदराज मतदाता मानसिक रूप से स्वस्थ हो , वो जिंदा लाश न हो ,जैसे कि अटल बिहारी वाजपेयी जी और दिलीप साब के बारे में कह सकते हैं ,जो मानसिक रूप से अचेतन अवस्था में हैं। इक -इक मत बेशकीमती है, तो नव अपरिपक्व पीढ़ी को मताधिकार का हक खैरात में देना, भयंकर राजनीतिक और लोकतांत्रिक भूल है ।इस पर विचार होना चाहिए ! इसके लिए देश की सच्ची सरकार वर्गीकरण करे कि 18 वर्ष ,19 वर्ष 20 वर्ष 21 वर्ष , यू ही 22 ,23 ,24, 25 26, 27 ,28 ,29 ओर फिर 30 बाद 31 से 35, 36 से 40, 41 से 45 ,46 से 50, 51 से 55, 56 से 60 ,61 से 65 ,66 से 70 ,71 से 75, 76 तो 80 ,81 से 85 ,86 से 90, 91 से 95 ओर 95 से ऊपर जो मानसिक रूप से भी स्वस्थ हो। साल के 365 दिनों में व्यक्ति की उम्र और समझ बढ़ती है।
इस जटिल प्रक्रिया में मशक्कत ओर भेजा-पट्टी तो है लेकिन इससे देश की जो सरकार चुनी जाएगी वो सही चुनी जाएगी। और राजनेताओं ओर पार्टी उम्मीदवारों के मन मे भय या फोबिया रहेगा कि किस तरह से परिपक्व मतदाताओं का मन जीता जाय और उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरा जाए।लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार जनता की माई- बाप होती है और सरकार की योजनाएं उस की उन्नति और अवनति का कारक होती हैं सो मतदान अधिकार को हल्के में न लेकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ये क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए विचार विमर्श करना ही चाहिए। 18 से 29 वर्ष तक मतदान सिर्फ भीडतंत्र को बढ़ावा देता है।और युवा वर्ग भीड़ और भेड़ तंत्र होकर सही -सही पक्ष में मतदान नहीं करता है।वह छलावों ,झुमलों वादों का पिछलग्गु हो अनिर्णय की स्तिथि में भ्रमित हो छद्म पक्ष को मत दे रहा है उसे भान नही है या अहसास नही है और फिर वह छला जाता है ।जब उसकी आकांक्षा पर सरकार खरी नहीं उतरती तो वह अपरिपक्व युवान कुंठित -क्रोधित, कुपित हो उठता है और देश के वातावरण में आक्रोश पनपता है ।और फिर हर नोजवां, एंग्री यंग मेंन बन जाता है! जब उस नवयुवान वर्ग की बहुलता से देश की सरकार चुनी गई है तो 5 वर्ष तक उसे झेलना ही है।इस अपरिपक्व वर्ग की वजह से देश के परिपक्व वर्ग को बहुत कुछ झेलना पड़ता है। जबकि उस परिपक्व वर्ग की कोई गलती नहीं है क्योंकि उसने तो बिल्कुल सही व्यक्ति के पक्ष में ही मतदान किया है । लेकिन लोकतंत्र में बहुमत ही अंतिम सत्य है तो उसका मत शून्य भूमिका निभाता है जबकि अपरिपक्व वोट राज करते हैं।18 वर्ष मतदान उम्र से मतदाताओं की संख्या बढ़ती है ,देश बढ़े कहना विचारणीय बिन्दु है। तो फिर वोट देने की लाजमी उम्र क्या होनी चाहिए ? शायद 25, हाँ 25 की उम्र प्राप्त व्यक्ति जीवन के कुछ झमोलों से झकड -उलझ सजग बन जाता है । लेकिन उम्र की दहलीज या सीमा मताधिकार के लिए 30 तय कर दी जाए तो आज की नवपिढ़ी की भावना के साथ खिलवाड़ हो जाता है और कुंठा को बढ़ाता है कि उनकी आधुनिक सोच -समझ को गौण समझा गया है जबकी मानसिक रूप से वो सक्षम हैं।लेकिन ये तय है उम्र किसी सही निर्णय को लेने में विशेष भूमिका अदा करती है। इसमें दोराय नहीं हो सकती। इस पर मनोवैज्ञानिकों ने बहूत कुछ लिखा है । उम्र को यदि वर्गीकृत करें तो 18 से 20 पूर्व अपरिपक्व,
21 से 25 अपरिपक्व ,26 से 30 आंशिक परिपक्व ,31 से 35 परिपक्व ,36 से 40 अर्ध परिपक्व ,41 से 50 पूर्ण परिपक्व, 51 से 60 अतिपरिपक्व ओर 61 से 70 सठीयाही परिपक्व आदि।
बुढापा बचपन का पुनरागमन है तो 70 के बाद सोचना चाहिए कि मतदाता मतदान में मानसिक रूप से स्वस्थ हैं या नहीं ओर उसमे बच्चे सी आदतें घर कर गयी हैं!
फिर इस ढांचे या सिस्टम में औसत या प्रतिशत तय किया जाय कि पूर्ण परिपक्व को इतने अंक, फला वर्ग को प्रति वोट इतना अंक यानी वोट की क़ीमत अंको में तोली जाय ,इस तरह ओसत ओर प्रतिशत तय कर उम्मीदवार चुने जाऐ । और प्रधानमंत्री जैसे पद के लिए उम्मीदवार किसी पार्टी का न हो इसमे देश कुछ बुद्धजीवी व्यक्तियों पर मोहर लगाए और दो या तीन राउंड में उसके प्रति मतदाता का रुझान भांपा जाय फिर प्रधानमंत्री तय हो मतदान द्वारा ।और देश- जनता विरोधी कार्य पर तुरंत जनमत का अधिकार जनता को मिले की चुनाव आयोग जनता की सिफारिश न्यायालय में लगा तुरंत उस व्यक्ति को बर्खास्त कर नया व्यक्ति चलने का ऐलान कर। चुनाव की कोई मियाद अर्थात 5 वर्ष तय न हो क्योकि तय मियाद से व्यक्ति बहुत कुछ भ्रष्टता की तरफ आकर्षित होता है ओर वह उस तय अवधि में अधिकाधिक बटोरने को उद्दत होता है।अतः इसमे जब तक उसका कार्य संतुष्ट है वो पद पर बना रहे।इससे चुनावी खर्च बच जाएगा।
दूसरी महत्वपूर्ण बात शिक्षा की।लोकतंत्र में शैक्षिक योग्यता बहुत मायने रखती है।जैसा कि देश के महान दर्शन शास्त्री , शिक्षाविद ओर विचारक सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा है, “पूर्ण उच्च शिक्षित मतदाताओं के बगैर लोक तंत्र कारगर ओर सफल नही है।” और ऐसे में आलोचक और महान राजनीतिक शास्त्रियों ने लोकतंत्र को मूर्खो का शासन कहा है, असत्य वदन ठहर के रह जाए ! आज केवल बहुमत आधारित मापदंड ओर रीतियों नितियों से अनपढ़ उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों पर शासन कर रहे हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टी की उम्मीदवारी के लिए उम्र और शैक्षणिक योग्यता तय हो। और सभी पार्टियों के उम्मीदवारों के प्रचार प्रसार के लिए समान बजट सिर्फ सरकार अपने कोटे से दे जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा न मिले और न ही हो ।पार्टीयों को डोनेशन सिस्टम बन्द हो जाये और कॉरपोरेट जगत को फायदा पहूँचाने वाली शासन में आने वाली पार्टी पर लगाम स्वतः ही लग जाए।
कॉरपोरेट और आम जनता स्वयम सीधे सरकार को डोनेशन दे जो गुप्त ओर अनाम हो।यदि लोकतंत्र में भी अपढ़, बुद्धिजीवियों पर राज करेंगे, पीछे हाथ बांध खड़े रहेंगे तो राजतंत्र ओर लोकशाही में क्या अंतर, की अपढ़ अकबर सम्राट ओर विद्वान बीरबल उसका मंत्री। वोट के लिए अलग अलग केटेगरी हो अर्थात अनपढ, साक्षर, 10 वी 12 वीं स्नातक, अधिस्नातक, डिप्लोमाधारी ,व्यावसायिक डिग्री धारी सबके मत अलग अलग पड़े और फिर उसके भी अंक हो फिर उस जोड़ से उम्मीदवार चुने जायें।यानी अशेक्षिक -शैक्षिक औऱ अतिशेक्षणिक व्यक्तियों के मतों के पॉइंट या अंकीय सिस्टम से राजनीतिक उम्मीदवार सरकार के लिये व विपक्ष के किये चुने जाऐ।
अनपढ ओर कम पढ़ मतदाताओं का छलावे ,झुमलों ओर वादो से आसानी से ब्रेन वाश किया जा सकता है, लपेटा जा सकता है, मंत्रमुग्ध औऱ आसक्त किया जा सकता है ।लेकिन एक पढ़े -लिखे और परिपक्व व्यक्ति को इतनी आसानी से खयाली पुलाव दिखा कर नही छला जा सकता है।
इस आलेख का निचोड़ यह कि देश मे जो भी लोकतांत्रिक सरकार बने और विपक्ष बने वो पुष्ट ओर उन्नत हो कि वो सरकार आदर्श हो और देश के साथ और देश की जनता के साथ न्याय कर सके। ऐसी बेसिर पैर वाली योजनाओं का आच्छादन न हो कि देश रसातल में धकेल दिया जाय और देश की जनता बेवजह इससे त्रासदी का शिकार बने। और सत्ता में रहने के लिये पूर्ण रूपेण कारगर कदम ही उठाये। तभी लोकतंत्र की सार्थकता साबित होगी, नही तो जो ढर्रा चल रहा है चलता रहेगा । अयोग्य सरकार आती रहेगी, जाती रहेगी और देश और जनता प्रत्यक्ष औऱ अप्रत्यक्ष रूप से इसे भुगतती रहेगा। मैंने जो दलील ओर तरीके अपनाने की वकालत की है इसे ईमानदार सरकार और चुनाव आयोग लागु कर सकता है।लेकिन इसे भी राजनीतिक रंग में घोल कर देखेंगे तो चालाक और धूर्त राजनेता इसे लागू नही करेंगे क्योंकि फिर इनका गौरख पेशा,रुतबा सब खों जाएगा। हाँ जो योग्य है इसे सहर्ष स्वीकारने की वकालत करेंगे।इस विषय के निष्कर्ष में सबसे अहम तर्क यह कि चुनाव में जब भी दो निकटतम प्रतिद्वंद्वीयों के बीच नतीजा आता है तो जीत का अंतर जो भी रहता है या स्पष्ट रूप से 60-40 का रहता है तो जाहिर है 40 फ़ीसदी वोट आपके खिलाफ ही गये हैं तो जिस सिस्टम की बात मेने की है उससे कोई फर्क नही पड़ेगा कि सिर्फ पूर्ण रूप से परिपक्व मतदाताओं के अंकों के आधार पर एक विशुद्ध ओर निर्विवादित सरकार देश के लिए बनती है।इस विषय मे कुछ सकारात्मक क्रांतिकारी कदम उठाया जाए तो देश हित मे होगा ।
*नरेश कुमार सेवक “सनातन”
उदेपुर, राजस्थान
मोबाइल 7742537602