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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

From Sanatan's Writing Blog

रक्षाबंधन आत्मीय रिश्तों का आसमान

“ अग्रजानुजा रक्षा पर्व भारत महान”

रक्षा बंधन भाई–बहन का आना, है अनोखा बंधन !
त्योहार ये भारतीय संस्कृति, है परम्परा का वन्दन !

कई किंवदंतियाँ, कई कथाएँ, लोक कथाएँ, गाथाएँ~
ये आत्मीयता की धरोहर ,रक्षा-करम धर्म जताएँ
रक्त भाई, धर्म–भाई ,जो भी हो मरते दम निभाएँ !!

धर्म का धागा, अनुराग का वादा, खुशियाँ ढेरों बिखराएँ ।
परम्परा ये चीर काल की, राजा बलि–वामन अवतार, की
बढ़ती आई सजती आई ,रूप बदल स्नेहाभक्ति
हिन्द धरा पर पोषिताए,हर्षाए ।।

रक्षा ही धर्म बहना रिश्ता, राष्ट्र परम्परा दिलों जान की ।
आत्मीय दिलों की आवाज़ है राखी पर्व भारत महान की ।।

कालान्तर प्राचीन मध्य इतिहास मार- काट नीज़ अट्टहास का ।
आज मालवा कल मेवाड़ किस्सा गांधार मध्य महान का ।।

कोई नहीं सुरक्षित किस्सा सिर्फ युद्धों आधिपत्य मानसिक्ता का ।
कब किस पर हो आक्रमण ,इतिहास अनिश्चितता शंकित भाव का ।।

युग-युगांतर क्रूर इतिहास रहा ,बिखरे भारत भाल का ।
नीज़ स्वार्थ समृद्धि ,आपसी बैर, ललचाया मन विदेशी खाल का ।।

तब उजागर कमजोर चेहरा, भारत बड़े मान–शान का

वीरता ताकत में सानी नहीं कोई, वीर भारत शान का

कईयों के छक्के छुड़ाये, मैदानी
जंग में सजा इतिहास भारत का
सदा सीने पर ही गोली ,तलवार झेली
दुश्मन भी लजाए क्या खाक जीत, उनको चंदन, रोली

भारत वीर रणबांकुरों की सदियों से खान रहा
भारत रहा इतिहास वीरों शूरो रणबांकुरे रणभेरी रोद्रम मान का

युद्ध भी हमने लड़े हैं नैतिक गुणों बाह, थाह में
लेकिन रिपुओं ने अपनाए पैतरे शकुनी चाल के

धोखा, महत्वाकांक्षा स्वार्थ ,अवगुण पाले ओर जी भर गहराऐ

आक्रान्ताओं की नियत बुरी, अस्मत अबलाओं की~
भय प्राण में
हर भार्या किसी की बहन–बेटी जब योद्धा निकले महासंग्राम में !

तिलक लगाती , हाथ राखी सजाती ,आरती उतारती, मीठा मुँह करवाती !
प्यार वारती,विश्वास ढालती, विजयी गीत गाती, आशीष बरसाती स्नेह दुलराती
इक पवित्र धागे का महत्व जताती !!

राखी पर्व दुनिया देश कही नहीं
भारत की ये धार्मिक परम्परा सिर्फ यही

रक्षा आस्था पर्व राखी ,भाई-बहन बड़ा पावन महान
रानी कर्णावती राखी भिजवाये मुगल हुमायूँ दौड़े चले आए

हाँ ले धर्म धजा मानस जहान
है ये किस्सागोई या के हक़ीक़त या तो इतिहास, के ईश्वर जाने
लेकिन करम वो ईलाही मानव धर्म धजा लहराए, हर्षाए
लकी  पूत हुमायूं अकबर सहिष्णु माथ पगड़ी,तीलक भाल शोभए
भाई बहन का अतुल्य स्नेह रस बिखरे मीठे रंग सात- महान

सात सुरों में बजता जाए सरगम, लिए हिन्दू मूल्य महान
आओ  भाइयों भारतवासी, हर बहन दामिनी–यामिनी हमारी

इज्जत सतीत्व पतिव्रत ,कोमार्य सब कीमती जेवर समान
क्या हिन्दू क्या सिख क्या ईसाई इस्लाम, ये सब की जान

माने अगर हम ऐसा दैविक इलाही रूहानी ऊपरी ऐलान
तब बहने बहनें-बेटी माताएँ पत्नी सब महफूज रहें सरे बाजार !

तब ना कोई दामिनी -निर्भया पीड़ित-पीड़िता
हो चाहे दिन या रात हर मादा-नारी बिंदास प्रियंका

ना कोई छुपे घोड़े फ़िज़ा में
ना कोई भेड़िया रंगा सियार
फिर काला बुरा विषैला, नही कभी वो अध्याय !!
NK सनातन

अग्रजानुजा (बड़ी -छोटी बहनें) रक्षाबन्धन पर्व सांसारिक ,भौतिक दर्पण में !

रक्षाबंधन -सुरक्षा बंधन–धर्म बंधन-आत्मिय स्नेहा बंधन-भाईबहन आत्मिय बंधन,रंजन

राखी अर्थात एक रक्षा सूत्र । इस पवित्र-पावन पर्व को विशेषकर हिंदुस्तान में हिन्दू सनातन धर्मी और संसार के सभी हिन्दू परिवार ये पर्व प्रतिवर्ष भारतीय विक्रम पंचांग अनुसार मनाते हैं! इस पुनीत अवसर पर बहने अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। जिन बहनों के सगा अर्थात जामाता भाई नहीं होता वे मुंहबोला यानी धर्म भाई बनाती हैं । ठीक उसी तरह जिन भाइयों की सगी बहन नहीं होती वो धर्म बहन से राखी बंधवाते हैं ।

बहनें भाईयों को क्यों राखी बांधती हैं ,भाई क्यों बहन को राखी नहीं बांधते हैं !?!

इसका कारण सामाजिक व्यवस्था और आदि परंपरा की- बेटी हमेंशा पराई मानी जाती है , क्योंकि एक रोज़ उसके व्यस्क होंने के बाद उसे दुल्हन बन पराए घर जाना ही है । मेरे पठन एवम श्रवण अनुसार संसार और संसार के अधिकतर समाज शुरू से ही पुरूष प्रधान रहें हैं । और इसी कारण प्रत्येक दंपत्ति संतान के रूप में बेटे ही चाहते हैं । क्योकि 21 साल नाज़ों में पली-बढ़ी बेटी को कीसी की दुल्हन बना विदा करना है , एक पिता ,एक माता और उसके भाइयो द्वारा । और वो घड़ी हृदय विदारक होती है क्योंकि पिता ने बेटी के लिए कितना ही अच्छा घर ढूंढा है, लेकिन उसका वहां भविष्य पराए हाथों में होगा। हालांकि वो पराया घर तब धर्मानुसार उसका अपना हो जाएगा जिससे उसकी शादी होती है। लेकिन वहां उसे सुख मिले, दुःख मिले उसकी गारंटी नहीं।
एक उसके असली माँ-बाप,भाई ,बहन लेकिन उधर पति के माता-पिता जो सास-ससुर,पति का भाई-बहन देवर-ननद यानी ये रिश्ते अपने आप मे एक शादी कर दुसरे घर जाने वाली लड़की के लिए पराए का ही अहसास रहते हैं । अर्थात सगे भाई,बहन,पिता-माता सा अहसास कतई नहीं रहता। और वो लोग भी उसे उस अपनत्व से नहीं देखते ,नहीं देख सकते । यहां तो सौतेला भाई,सौतेली बहन के रिश्ते में ही सौतेलापन दिखता है, यानी सगे का अहसास नहीं होता जबकि पिता एक ही हैं ,उन संतानों के ! ये आईना रखने का कारण ये की मेरे मनन में सार की बहनें भाई को राखी क्यों बांधती हैं, भाई बहन को राखी क्यों नहीं बांधता !? सामाजिक दृष्टिकोण में बेटी का बाप हमेंशा विनीत होता है क्योंकि बेटी पराई होने पर ससुराल पक्ष में तो वहां वो सुखी रहे । उसके साथ ससुराल अच्छा व्यवहार करें। स्त्री को समाजों ने हमेंशा अबला ही माना तभी महिला सशक्तिकरण की ज़रूरत पड़ी। आधुनिक युग मे कानूनी संरक्षण और समान शिक्षा ने नारी जाति को सशक्त किया है । दहेज़ प्रथा पर रोक ने बेटियों के पिताओं को राहत की सांस दी है। तलाक़ कानून ने भी स्त्री को सशक्त बनाया ! लेकिन सामाजिक कमजोर कड़ी की भाई की बहन को व्यस्क होते ही उसे विदा करना है पराए हाथों में सौप जो घर उसका होगा !
तो साफ़ है बहन पराई हो गयी । वहां ससुराल में सिवाय पति के उसके कोई अपना सगे संबंधी जैसा नहीं । सिर्फ़ पति ही उसका क्योकि धर्म से वो उसकी हो जाती है। उधर उसका सगा भाई भी शादी करता है और शादी के भाई की बीबी भाभीश्री होकर कानूनन उस घर की मालकिन बन जाती है !
औऱ उस घर मे अब वो ननद रह गयी बेटी नहीं । अब उसके पास वो आज़ादी ,वो अधिकार नहीं रहे जो शादी से पूर्व थे। साधारण सी बात कि वो अपनी इच्छा से किचन में नहीं जा सकती। किसी अलमारी को नहीं खोल सकती । उसके लिए उसे चाबी भाभी श्री से मांगनी होती है और कोई भाभी सहजता और विश्वास से तुरंत चाबी नहीं दे सकती। यानी उसका सीधा दखल नहीं रहता । हालांकि नवीन कानून ने बेटियों को भी पिता की संपत्ति में बराबर का हक दिया हैं ! इससे भी बहन का वजूद बड़ा है ! लेकिन हकीकत की दुनिया अलग है ! क्योंकि जब तक उस बेटी के माता-पिता जीवित हैं बेटे-बहु के साथ रहते हैं तब तक बेटी को कुछ अपने पन का अहसास रहता है कि मेरे माता-पिता का घर। लेकिन उनके नहीं रहने से वो घर बिल्कुल पराया हो जाता है। भाई दो पाटों में फंसा रहता है, यानी एक तरफ उसकी पत्नी,उसके बच्चे यानी उसका संसार,उधर बहन जो अब पराई है । किसी की जिम्मेदारी है ,उसके भी बच्चे। लेकिन भाई -बहन का रिश्ता तो है लेकिन ज़ाहिर है औऱ कटु सत्य की कोई भी भाई अपनी पत्नी को ही अधिक महत्व देगा क्योकि उसकी विवशता है , क्योंकि उसे उसके साथ जीवन बिताना है ,उसने उसे उसकी संतान दी है । शारीरिक सुख ,भौतिक सुख का वो स्त्रोत है अर्धांगिनी होकर उसकी पूरक बन जाती है और ये पूरकता उसके जीवन को पूर्ण बनाती है! लेकिन आखिर भाई-बहन का खून का रिश्ता होता है और आवश्यकता होने पर वो बोलता है अर्थात भाई अपनी बहन को किसी भी तरह की मदद करता है यदि वह समर्थ है और यदि नहीं भी है तो हर संभव प्रयास करता है अपनी बहन के लिए । और बहन दूसरे घर मेफूज़ रहे भाई ये कामना करता है । राखी सूत्र ये अहसास कराता है कि भाई मैं भले ही किसी दूसरे घर की रौनक बन गयी हूँ , लेकिन जब पिता-माता और भाई तुम्हारी बात आती है, सारी रोशनी, रौनक फीकी लगती है। बहन चाहती है कि उसका भाई हमेंशा सबल और सलामत रहे , जिससे यदि कोई उसके संकट की घड़ी आवे तो भाई तुरंत उसकी सहायता एवम सम्बल को पहुंचे !

पौराणिक गाथा रक्षा बंधन के संदर्भ में

( मेरे पठन-वाचन एवम श्रवण के आधार पर- इसमे मेरा तथ्यात्मक दावा नहीं है )

भारतिय पौराणिक मान्यता और शास्त्रों में वर्णित प्रचलीत और लोकप्रिय साक्ष्य के आधार पर प्रथमेव रक्षा सूत्र बांधने की शुरुआत पुरोहितों अर्थात ब्राह्मणों ने चक्रवर्ती सम्राट बलि को बांध के की कि वो उनके कर्मकांडों में दानव-राक्षस बाधा डालते थे, उससे उनकी रक्षा करे , जिससे धर्म की रक्षा हो ! पुरोहित चूंकि देववाणी के विद्वान होते थे तो उन्होंने रक्षा सूत्र यानी रेशम या सुत का धागा बड़े पावन मंत्रोच्चार कर राजा के दाहिने हाथ मे राखी बांधी । राजा को रक्षा सूत बाँधने से पहले तिलक -अक्षत यानी चावल लगाए। राखी बांधने के बाद उन्होंने राजा को प्रसाद स्वरुप मेवे- मिष्ठान खिलाए। राजा ने उन्हें आश्वाशन दिया कि वे सदैव उनकी रक्षा करेंगे । और राजा ने उन पुरोहितों को भेंट स्वरूप सोने चांदी हीरे जवाहरात की भेंट दी । ब्राह्मणों ने राजा को आशीर्वाद दिया की उनका वैभव ,सामर्थ्य हमेंशा बना रहे। उस अवसर पर शाही भोज का भी आयोजन कर खुशियां दुगुनी की। क्योंकि खाने की ये ताकत है, ये तासीर है की ये जीभ से लग स्वर्गिक अनुभव दे ,पेट मे जा ,दिमाग मे जाता है और मानसिक्ता को पुष्ट कर वातावरण में स्वस्थता और खुशियां बिखेरता है, फैलाता है !! यानी कहावत चरितार्थ-” जिसकी खाते हैं,उसकि बजाते हैं !”

विशेष रूप से बहनों द्वारा भाईयों को राखी बांधने की आम और ख़ास शुरुआत

द्वापर युग मे राखी प्रतिकतम रक्षा सूत्र बनी ,तब जब एक घटना में भगवान श्रीकृष्ण जनार्दन वासुदेव जगन्नाथ के हाथ की अंगुली में हल्की सी चोट लग खून बहने लगा तब जब उन्होंने शिधुपाल के 100 गुनाह पूरे हो गये तब अपना दिव्यास्त्र सुदर्शन चक्र भरी सभा मे चला शिशुपाल का वध कर दिया । अंगुली से खून निकलता देख पार्थ अर्जुन की पत्नी जो रिश्ते में चचरे भाई की पत्नी यानी अर्जुन की भार्या एक बहन समान थी। द्रोपदी ने तुरंत फर्स्ट एड के रूप में खून को बहने से रोकने अपनी साड़ी का पल्लू चिर कर उनकी उंगुली में बांध दिया। इस कृत्य से द्रोपदी ने श्रीकृष्ण को सीधे धर्म भाई बना लिया । और जब द्रोपदी का चीर हरण हुआ कौरव सभा मे दुःशासन द्वारा तब भगवान कृष्ण ने अपनी मायावी शक्ति का परोक्ष प्रयोग कर द्रोपदी का चीर इतना बढ़ाया इतना बढ़ाया कि दुःशासन थक गया और निर्बल हो गया और सफल नहीं हुआ!!

मध्यकालीन भारत मे रक्षा बंधन की शुरूआत (मेरे पठन के आधार पर, दावा नहीं)

जब भारत की समृद्धि से विदेशी आक्रांता भारत आए तो उन्होंने न केवल भारत की संपत्ति लूटी बल्कि राजाओं को पराजित कर उनकी रानियों,राजकुमारियों और अन्य दासियों,महिलाओं की इज्जस्ट लूटी। इससे बचने भारतीय महिलाओं ने सती होना अर्थात जीवित ही अग्नि कुंड में जल कर प्राण त्यागना शुरू कर दुश्मन भेडियो से बचना व इज्जत की रक्षा करते हुवे दुनिया से विदा लेना शुरू किया । तब राज्य विस्तार में विदेशी आक्रमणकारी सुल्तान ,बादशाह उनके सैनिक पराजित या मृत राजाओं की विधवाओं ओर उनकी बेटियों ,बहूओ से बलात्कार अर्थात शील कौमार्य भंग करते थे । इसलिए जब राजा अपनी सेना, मंत्रियों, सेनापतियो
सहित युद्ध को प्रस्थान करते तब उनकी बहनें आरती ,तिलक भाल पर लगा कर रक्षा सूत्र बांधती थी और ईश्वर से कामना करती थी कि उनके भाई सही सलामत युद्ध में शत्रु को पराजित कर लोटे और उनकी अस्मिता अक्षुण रहे । तब देववाणी में उकेरे वो श्लोक साधारणतः महिलाओं को याद नहीं होते थे तो राजपुरोहित राखी बांधते समय मंत्रोच्चार करते थे। मंत्रोचार से सेनिको औऱ योद्धाओ मे शक्ति और विश्वास जगता था। ऐसा माना जाता है कि कालांतर में ये परसम्परा आम हो कर खास हो गयी और प्रत्येक सनातन हिन्दू परिवार में रक्षाबंधन पर्व स्थापित कर राखियां बांधी जाने लगी । आज वर्तमान में ये त्योहार आत्मिक बहन -भाई स्नेह का आसमान बन गया हैं!

राखी पर्व मनाने की आम विधि

रक्षा बंधन वर्ष में एक निश्चित दिन भारतीय पंचांग तिथी अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । चूंकि ये रक्षा से जुड़ा त्योहार है तो पंचांग में मुहूर्त अनुसार राखी बांधी जाती है । वैसे कई परिवार जिन्हें ईश्वर की शक्ति पर भरोसा होता है बिना मुहूर्त चोघडीया
दिन भर बिंदास राखी बांधते हैं ! क्योंकि उनका विश्वास की दुनिया मे न आने का ,न जाने का मुहूर्त तो फिर अन्य काम में मुहूर्त की क्या ज़रूरत । लेकिन जो परिवार शास्त्रीयता और धार्मिक परम्परा में अटूट श्रद्धा -विश्वास रखते हैं ,सटीक मुहूर्त अनुसार ही राखी बांधते हैं।

राखी रस्म

बहनें जो ब्याहता यानी शादीशुदा हैं, अपने पिता के घर जाती हैं जहां उनके भाई उस पैतृक सम्पत्ति के मालिक हैं। वहां वे अपने भाइयों को भारतीय सनातनी धार्मिक रस्मानुसार अपने भाइयों के भाल पर तिलक लगाती है यदि भाई कुंवारा है और यदि वो विवाहित हैं , तो तिलक के साथ चांवल भी लगाती है। फिर उसकी आरती उतारती है औऱ उसके बाद भाई के दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधती हैं ,फिर उसे मिठाई खिलाती हैं और गले मिलती है। भाई उपहार स्वरूप खुशी से अपने सामर्थ्य अनुसार उसे रुपये ,रकम ,गिफ्ट आदि भेट करता है । खुशी में घर पर मिष्ठान बनते हैं और पूरा परिवार साथ- साथ खाना खाता है,खुशियां मनाता है।

बहनों का धर्मसंकट

सबसे बड़ी समस्या शादीशुदा बहन के लिए की उसे उसके भाई के घर जाना है राखी बांधने ! उधर उसके पति की बहन भी आनी है । अब ननद बाई सा की आवभगत ,स्वागत कौन करे। उसके लिए स्वादिष्ठ भोजन,मेवे- मिष्ठान्न कौन परोसे ! लेकिन किसी तरह भारतीय बहने सब कुछ मैनेज करती हैं और सब कुछ सौहार्दपूर्वक वातारण में त्योहार मनाती हैं! और अपने भाइयों को ख़ुशी देती हैं, और खुद भी जीवन के दैनिक रूटीन से फ्री होकर खुशियां बटोरती हैं । बहन के बच्चे को मामा के घर जाने का विशेष मौका मिलता है और भांजो को मामा से विशेष प्यार मिलता है!

कुछ खास पौराणिक महा कथाएं एवम मान्यताएं रक्षा बंधन पर्व को लेकर

(ये सब कथाएं लोक कथा के अंतर्गत प्रचलित हैं,शास्त्रों में भी उल्लेखनीय हो सकती हैं)

भगवान विष्णु का वामन अवतार और राजा बलि

(ये एक प्रचलिग पौराणिक लोक कथा है) भगवान विष्णु ने वामन अवतार अर्थात एक ब्राह्मण बालक का रूप लेकर असुर राज बलि जो तीनों लोकों के राजा थे, से तीनों लोक दान में मांग लिए और राजा बलि ने वचनबद्ध हो खुशी से दे दिए। भगवान विष्णु, राजा बलि की उदारता, वचनबद्धता ,धर्म शीलता और त्याग से प्रसन्न और प्रभावित हो गए और असल रूप में आकर एक वरदान मांगने को कहा । बलि जो दान में सब कुछ गवा अब पाताल लोक मांगा और कहा की विष्णु हर समय उनके महल में रहें । तब भगवान वहां एक द्वारपाल बन के रहने लगे । उधर भगवान श्री हरिविष्णु की संगिनी लक्ष्मी जी इस बात से परेशान हो गयी । तब देवर्षि नारद जी की युक्ति पर लक्ष्मीजी एक साधारण गरीब महिला बन पाताल लोक गयी । वहां राजा बलि से भेंट कर उन्हें सेवा से प्रसन्न किया और एक रक्षा सूत्र राजा बलि के हाथ मे बांधा । तब राजा बलि ने एक वरदान मांगाने को कहा तब लक्ष्मी जी अपने असल रूप में प्रकट हुई, और उनके पति विष्णु जो द्वारपाल बने हैं को मुजत कर उनके साथ भेज दे ! राजा बलि ने तथास्तु कह श्री विष्णु जी को लक्ष्मी जी के संग बैकुंठ धाम भेज डिगा । यानी एक धागे ने कमाल किया ।

भविष्य पुराण में वर्णित गाथा (मेने असल पुराण पुस्तक नहीं पढ़ी ,स्त्रोत मेरा पढ़न,वाचन है )

भविष्य पुराण अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के युद्ध में जब देवता कमजोर पड़ने लगे, तब देवगुरु बृहस्पति ने इंद्राणी यानी इंद्रदेव पत्नी शची को ये सुझाव दिया कि इक अनुष्ठान में विधान द्वारा एक सिद्ध रक्षा सूत्र वो अपने पति की कलाई पे मंत्रोचार द्वारा बांध दे । ये रक्षा सूत्र कवच और सफलता का काम करेगा । शची जी ने वही किया और दाँवव इंद्रदेव द्वारा पराजित हुवे।
इस गाथा या किवदंती से ये सिद्ध होता है कि जीवन रक्षा एवम सफलता की कामना में
कोइ भी किसी को रक्षा सूत्र बांध सकता है ।

मध्यकालीन भारत की चर्चित कथा हुमायूं और महारानी कर्णावती [- जाति और धर्म को आइना दिखाती गाथा]

(आधार पाठ्यपुस्तक में पठन एवम अन्य स्त्रोत द्वारा भिज्ञ )
मुगल बादशाह हुमायूँ यानी अकबर महान का पिता और चितौड़गढ़ की महारानी कर्णावती के संदर्भ में एक
ऐतिहासिक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार, चित्तौड़ रियासत पर गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने आक्रमण करने कुच किया । जासूसों कि सूचना पर चित्तौड की महारानी जो राणा सांगा कि विधवा थी ने अपने दोनों पुत्रों पुत्र-विक्रमादित्य औऱ उदय सिंह को उनके ननिहाल बूंदी भेज दिया । सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से पूर्व दिल्ली के मुगल सम्राट हुमायु को अपनी मदद हेतु एक राखी और एक पत्र भेजा । लेकिन जब तक हुमायूं कि सेना पहुँचती बहादुर शाह जीत चुका था। और महारानी कर्णावती
कई महिलाओं सहित ज़ोहर कर चुकी थी । लेकिन एक हिन्दू परम्परा का सम्मान कर हुमायूं ने बहादुर शाह को पराजित कर विक्रमादित्य को राजा बनाया । इस तरह एक रक्षा सूत्र ने मानव धर्म की ऊंचाई को आसमान दिया ।

रवींद्रनाथ ठाकुर का राष्ट्रीय रक्षाबंधन सन 1905 में

( यह विवरण आधुनिक भारतीय इतिहास में प्रचलित संदर्भों पर आधारित है)

आधुनिक इतिहास में जब अंग्रेजी हुकूमत ने बंगाल विभाजन की घोषणा की, तब कवि रवींद्रनाथ के आह्वान पर हिंदू और मुसलमानों ने एक-दूसरे को राखी बांधकर सांप्रदायिक एकता और देश की रक्षा का संकल्प लिया था। ये एक दुर्लभ घटना है और भाईचारे का अप्रतिम उदाहरण हैं!

धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता

रक्षा का संकल्प: ‘रक्षाबंधन’ का अर्थ है—”रक्षा का बंधन”। इस दिन कलाई पर बांधा जाने वाला धागा केवल सूत का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति विश्वास, सम्मान और जीवनभर रक्षा करने का पवित्र संकल्प होता है।

रक्षा सूत्र बंधन के निमित्त धर्मिम मंत्र

राखी बांधते समय बोले जाने वाले पौराणिक मंत्र की बात करें तो वो महा पवित्र मंत्र धन की अधिष्ठात्री देवी मा लक्ष्मीजी ने राजा बलि को दक्ष सूत्र बांधते समय उच्चारित किया था। वो पौराणिक मंत्र इस प्रकार है-
(आधार वाचन-पठन दावा नहीं)

“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”

मंत्र का सरल हिंदी अर्थ

“जो रक्षासूत्र (पवित्र धागे) महापराक्रमी दानवराज बलि को माता लक्ष्मी जी ने बांधा था, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे रक्षासूत्र (राखी)! तुम अपने संकल्प से कभी डिगना मत, स्थिर रहना और मेरे भाई की सदैव रक्षा करना।”

मंत्र उच्चारण के नियम और विधि

(लेखन का आधार पठन ,श्रवण ,सत्य ही है का दावा नहीं )

★जब बहने अपने भाई को राखी बाँधती हैं तब मंत्र के साथ तीन गांठ लगाती हैं, तब इस मंत्र को मन में या ऊंचे स्वर में दोहराया जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार राखी की इन तीन गांठो त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास प्रस्तिकात्मक रूप से माना जाता है। हालांकि वर्तमान आधुनिक युग में मंत्र नहीं बोले ज्जते हैं क्योंकि संस्कृत एक कठिन भाषा है शब्दो मे औऱ उच्चारण में!

पुरोहितों द्वारा अपने यजमान को राखी बांधना

पुरोहित जब अपने यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं, तो वे मूल मंत्र का उपयोग थोड़े से शब्द भेद (परिवर्तन) के साथ करते हैं। बहनें जहां भाई के लिए “त्वामभिबध्नामि” कहती हैं, वहीं पुरोहित यजमान के लिए “त्वामनुबध्नामि” या “त्वाम् प्रतिबद्धनामि” शब्द का प्रयोग करते हैं!

पुरोहितों द्वारा पढ़ा जाने वाला मंत्र

“ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”

पुरोहितों के संदर्भ में इस मंत्र का अर्थ

जब एक पुरोहित अपने यजमान की कलाई पर रक्षासूत्र बांधता है, तो वह यह संकल्प दोहराता है: –
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः” – जिस रक्षासूत्र से दानवों के परम प्रतापी और महाबलशाली राजा बलि को (भगवान विष्णु के वामन अवतार द्वारा) धर्म के बंधन में बांधा गया था,
“तेन त्वामनुबध्नामि” – उसी पवित्र और मंगलकारी रक्षासूत्र से मैं आपको (यजमान को) बांधता हूँ, अर्थात आपको धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने के लिए संकल्पित करता हूँ।

“रक्षे मा चल मा चल” – हे रक्षासूत्र! तुम अपने कर्तव्य से कभी विचलित मत होना और इस यजमान की सभी संकटों, रोगों और नकारात्मक शक्तियों से सदा रक्षा करना।

पुरोहितों द्वारा रक्षासूत्र (मौली) बांधते समय पढ़ा जाने वाला वैदिक पौराणिक अनुष्ठान मंत्र इस प्रकार है:-
वैदिक दूर्वा (दूब) मंत्र (जिसमें ‘काण्डात्’ शब्द आता है):

ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।
एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च।।

और मुख्य रक्षाबंधन मंत्र (जो इसके तुरंत बाद जोड़ा जाता है-
ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल‌।

इस पूरे मंत्र का अर्थ और जुड़ाव

काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती…: इस मंत्र में भगवान से प्रार्थना की जाती है कि जिस प्रकार दूर्वा (दूब घास) की एक-एक गांठ और तिनके (काण्ड) से नया पौधा अंकुरित होता है और वह चारों ओर फैल जाती है, ठीक उसी प्रकार इस यजमान का वंश, आयु, कीर्ति और ऐश्वर्य भी सौ और हजार गुना होकर बढ़ता रहे।

येन बद्धो बली राजा…: इसके बाद पंडित जी रक्षासूत्र बांधते हुए राजा बलि वाला संकल्प पूरा करते हैं कि यह धागा आपकी हर विपत्ति से रक्षा करेगा।

राखी मंत्र को लेकर संशय, सवाल और गूढ़ अर्थ

पौराणिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी (रक्षासूत्र) बांधते समय भी इसी ‘येन बद्धो बली राजा…’ मंत्र का ही प्रयोग किया था।
लेकिन संस्कृत भाषा से हिंदी अर्थ समझने के बाद हर सनातनी में एक सवाल उठना स्वाभाविक है । क्या ????!!!!!!!!!!
वो ये कि अगर
माता लक्ष्मी स्वयं राजा बलि को रक्षा सूत्र बांध रही थीं, तो उन्होंने ऐसा मंत्र क्यों बोला जिसमें राजा बलि का ही नाम आता है? इसके पीछे एक गहरा रहस्य और कथा का संदर्भ है:
मंत्र के शब्दों का रहस्य की माता लक्ष्मी जी ने ऐसा क्यों कहा ? वो इसलिए कि-
वामन पुराण और की कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु के वामन अवतार ने तीन पग में राजा बलि का सब कुछ ले लिया, तब अंत में उन्होंने बलि को सूत (कच्चे सूत के धागे या रक्षासूत्र) से सांकेतिक रूप से बांध दिया था।
जब माता लक्ष्मी पाताल लोक गईं, तो उन्होंने उसी घटना को याद करते हुए राजा बलि से कहा:

“जिस प्रकार मेरे स्वामी (भगवान विष्णु/वामन देव) ने तुम्हें सत्य और दान के धर्मसूत्र (रक्षासूत्र) में बांधा था, आज एक बहन के रूप में मैं तुम्हें उसी पवित्र स्नेह और सुरक्षा के सूत्र में बांधती हूँ।”

इसीलिए इस मंत्र को ‘रक्षा सूत्र मंत्र’ भी कहा जाता है और ‘लक्ष्मी-बलि संवाद’ का मंत्र भी माना जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत और अंत इसी पौराणिक घटना से जुड़ी है।

💐 माता लक्ष्मी द्वारा उच्चारित मूल रूप

माता लक्ष्मी ने जब स्वयं राजा बलि को बांधा, तो उन्होंने मंत्र के बीच के एक शब्द को थोड़ा बदलकर बोला था:

“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि (या त्वामनुबध्नामि) रक्षे मा चल मा चल।।”
★ सामान्य मंत्र में: पुरोहित या बहनें ‘त्वामपि बध्नामि’ (तुम्हें भी बांधता हूँ) कहती हैं
माता लक्ष्मी के संदर्भ में:-
‘त्वामभिवध्नामि’ या ‘त्वामनुबध्नामि’ का अर्थ है— “मैं तुम्हें इस रक्षा के नियम में अनुशासित/प्रतिबद्ध करती हूँ।”

संक्षेप में कहें तो, माता लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को वचन में बांधने के कारण ही यह श्लोक हमेशा के लिए राखी का मुख्य मंत्र बन गया।

NK सनातन

विशेष साफ़गोई

इस लेख (गद्य) और कविता (पद्य) जिसे मैंने अंग्रेजी और हिंदी भाषा मे रची जाने वाली अलग-अलग लेकिन एक ही भाग में पाठकों के बीच रखने को पोएमप्रोजा (PoemProzAAAA) नाम से साहित्यिक आकाश में आकंठ किया है ! क्योंकि कविता( Poetry) को ज्यादा बड़ा लिखना यानी 800 -1000 शब्दों में लिखने को कोई बहुत बड़ा और वृहद-विशद विषय चाहिए और लिख भी दे तो मोबाइल और कंप्यूटर पर इतना लंबा जैसे जॉन मिल्टन ,वाल्मीकि, तुलसीदास ,वेदव्यास ने अपनी महान कृतियां बहुत विशाल शब्द राशि मे पिरोई हैं जो स्क्रीन पर पढ़ना मुश्किल सा है। इन्हें केवल पुस्तक के रूप में पढ़ना ज्यादा सहज है क्योंकि ये ग्रंथ हैं। हाँ, छोटे-छोटे अंशो में कम्प्यूटर और मोबाइल पर बैठ कर पढ़ा जा सकता है । E-लाइब्रेरी इसके लिए अद्धतन युक्ति है।

• मेरे लेखन में जो विचार हैं वो सांसारिक घेरे में मेरे दर्शन,मनन एवं मंथन के है ! हालांकि इस पर किसी अन्य के अन्य विचार भी हो सकते हैं और हो सकता है मेरी विचार सोच से वो हामी न रखे ।

• जहां तक ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक तथ्य जो मेने उकेरे हैं उनके संदर्भ में मैने रिमार्क उद्धत किया है यानी साफ़ है कि इसमें सत्यता का कोई दावा नहीं है, इसमें किसी की अन्य और अनन्य राय हो सकती है।

NK Sanatan