रास्ता ऐ मंझिल इक सी है
“रास्ता ऐ मंझिल इक सी है”
मै श्रीराम का दीवाना हूँ
तू महावीर का दीवाना है
वो बुद्ध का दीवाना है
वो जरथुस्त्र का दीवाना है
वो मोहमद का दीवाना है
वो प्रभु यीशु का दीवाना है
मगर तेरी ओर मेरी इबादत में
बस फर्क इतना है
तू तेरे तरीके मानता है
ओर मैं मेरे तरीके मानता हूँ
मगर धर्म के नाम पर हम बटने वाले -जरा सुन लें
फक्त सलीके जुदा जुदा
लेकिन मकसद इक सा है
मज़हब के नाम पर इतराने वालो
कबीरा तेरे तरीको पर ओर मेरे तरीको पर हाँ बराबर रोया है
मरने पर उसके जलाने दफनाने के नाम हंगामा बहुत हुवा
चमत्कार तब खुदाई ऐसा हुवा
लाश तब फूल में बदली
आधे तुमने लिए ओर आधे हमने लिए
ओर मानवता का खुशहाल डंका बजा
महक उधर बिखरी महक उधर बिखरी
ओर गंगी-जमनी तहजीबी मिसाल ऐ दौर का आगाज़ हुवा
मर्म इस बात में दीवानों जरा सुन लो
मरने पर कोई धर्म नही
मिट्टी बस मिट्टी तेरा मेरा हश्र हुवा
हम मंदिर मस्जिद गिरजे पे लड़ने वाले
बस हकीकत इक सी जान ले
सबका मालिक बस उपर रहता
ये सच हम सब माने जाने
शिव सब शक्तियों की अजब निशानी है
जहर पी ले जहां के लिए
न कोई उनका सानी है
कभी माँ भवानी दीवानी हुई
कभी माँ गोरा रानी मदमायी
वो दक्षराज थे जो झुक गये
सब जग जाने पहचाने हैं
ओ आशुतोष शिव शंकर
तेरी अद्भुत कहानी है
प्रभु राम के सब दीवाने
मगर-2
श्रीराम भोले शम्भु को आराधे
मैया लक्ष्मी संग भगवान विष्णु बिराजे
ब्रम्हा संग ब्रह्माणी
ओर भगवान महेश संग
माँ भवानी राजे
चिरंतन सुख अनुरंजन नाम में इनके-2
बस भजे शिव ओर शिव भजाये
कोई फर्क नही तू उनको भजे
या उनहे
मोत पर दिखते -2
सब के बस एक से सायें
तू बस ये मंझर याद रखना
अंतिम सत्य यही
नादां नही कोई
दर्श ये सब ये जाने
सच ये जीते जी जाने
या किसी के मरने पर
मगर जब भी जाने
तो जाने इसे दिल से माने
की की मंझिल सब की यही
परिणाम सब का इक ही
जाने तू प्यारे
ओर ओर जानू मै भी प्यारे
*रचयिता
नरेश कुमार सेवक “सनातन”
फाउंडर काव्यांगन साहित्यिक संस्था उदयपुर