★हम कितना जी रहे हैं ? ★
जीने को , जी रहे हैं हम
हँस-हँस या रो-रो के, सब
यूँ कहने को तो ,जी रहे हैं बहुत
मगर कुछ नहीं, है भ्रम के सबूत
जीना कहां, अपने बस मे
जिलाता वो ,जैसे जिलाये
लेकिन सवाल ये की-2 वाकई, कितना जी रहे हैं ?
हम जी रहे हैं भाररपूर्वक
अपनो के लिए हार पूर्वक
पांच से पच्चीस सुनहरे
हां अपने सपनो के लिए
फिर सामाजिक बंध-
अनुबंध
जिम्मेदारियां निभाते , बोझ तले
हैसियत के लिए, समाज के लिए अंध
की क्या कहेंगे लोग ,सोच में अंग-भंग
संभलते, सोचते डरते हुवे
दिन ब दिन, संवरते हुवे
अगर, सही समय पर शादी
यानी 21 से 25 पर काजी
तो संतति सुख ,बन साज कामी
जिस पर ,समाज की भी हामी
और, उनकी जिम्मेदारियो से युक्त
उम्र 50 तक, एक पारी से मुक्त
फिर भाग्यशाली पुत्रवान , तो पोता-पोती
अगर पुत्रिवान तो बड़भागी , दोयता-दोयती
ये रिश्तों का साम्राज्य, विस्तारवादी
ओर कहने को सुराज, यथार्थवादी
लेकिन लफड़ो-पचड़ो का चक्र तो ,चलता ही है
जब तक है जीवन ,ये तो रहना ही है
क्यो की संतान सुसंस्कृत, निकली तो किस्मत
न निकली तो मानो ,है ये बिगड़ी अस्मत
ये कड़वी -मीठी, नीति-रीति दुनियावी
मजबुर विवश हर कोई, हो भुगताई
कितना ही नाज़ो में पाला
मर -मर के लिए असर
मगर चढ़ता उन पर जैसे-तैसे बाहरी असर
कई कारक, तत्व निभाते, इसमे अपना कृत्य
लेकिन चाहे जो भी हो , स्वीकारना ही सत्य
आदमी एक कठपुतली, नाचे जैसे वो नचाई
डोर उस सर्वेश्वर के हस्त,
भाग्य जैसे रघुराई
हँसाये-रुलाये ,अपनाओ अपनी तरह
अच्छा-बुरा चलता, साये की तरह
मगर कब तक, निकले हवा तब तक व्यस्त
हवा निकली अपनी पीढ़ी की, सब अस्त
फिर आगे की पीढ़ी , जद्दोजहद में व्यस्त
ओर मायावी ,दुनियादारी में पस्त-मस्त
यू विस्मरण का साया, भूल जाता है जमाना
अंतिम सत्य के चलन में ,
खो जाता है जमाना
सब कुछ खाक, कुछ नही रहता रहन में
घुल जाता है सब कुछ, हवा-मिट्टी ओर पानी मे
रहता पर ,रहता कुछ नही, खजाने में
कहे कुछ भी, छूट जाता जमानें में !
*nk सनातन