साहित्य क्या है ?
साहित्य क्या है ??
साहित्य इस शब्द को संश्लेषित किया जाय तो स: हित यानी सब का हित
विवरणात्मक रूप से इसे समझे तो साहित्यिक का मर्म बहुआयामी ,विशद एवं वृहद है…
साहित्य मुख्य रूप से दो-शील ओर अश्लील
फिर शील में कई विधाओं का समावेश-शृंगार, वीर, प्राकुतिक या पर्यावरणीय, सामाजिक ,आर्थिक, औषधीय, खगोलीय,गणितीय, ज्योतिषई, भूगोलीय, वेज्ञानिकीय, मानविय, दर्शनीय,राजनीति किय, नैतिक ,धार्मिक, पारिवारिक, हासिल, लावणीय,समुद्रीय, जन्तुई, खाद्यान्य , कोकशाष्ट्रीय,नारकीय, पिशाचिय,भूतिया ,इतिहास ओर कई जो इस नश्वर संसार मे विषय परिलक्षित होते हैं या मनुष्य की सोच में है…
साहित्य दर असल एक व्यापक क्षेत्र है और ये समाज को दिशा देने व्यक्ति को अपना आईना दिखाने का परम स्त्रोत है
ओर दुनिया ने जो तरक्की की है उसमें साहित्य का विशेष योगदान है…
दुनिया समृद्ध साहित्य से लब्ध है जैसे
वैदिक ,ग्रीक, मिश्र,अरबी-फारसी,चीनी,बौद्ध बिबिलीक ,रोमन फिर प्राचीन मध्यकालीन,आधुनिक साहित्य जो प्रकाश स्तंभ हैं.…
रामायण,महाभारत, बाइबल, कुरान और महाकवि होमर का साहित्य वेद उपनिषद अरण्य पुराण ब्राह्मण आदि साहित्य मनुष्य जाति का चर्मोत्कर्ष है
साहित्य की दो विधा–
गद्य पद्य
इसमें पद्य का विशेष प्रभाव और स्थान रहा है क्योकि
ये लय राग ताल में गाया जाता है और गीत संगीत व्यक्ति के दिल ओ दिमाग पर मन्त्रमोहक असर डालते हैं
ओर गीता रामायण अपने साहित्य चरम परम् से बुराई पर अच्छाई पर विजय पर प्रकाश डालते हुवे नेतिक विकास और नेतिक मूल्य अपनाने पर फोकस करते हैं..
साहित्य का उद्देश्य धन कमाना नहीं समाज को मानव मूल्यों से उपर उठाना है यानी कि दैहिक मूल्यों से इतर दैविक मूल्यों पर जोर देना है…
कुल मिला कर साहित्य मानव का मानव से आत्मिक सामंजस्य का स्त्रोत है और सामाजिक परस्परता अपनाने का माध्य है
ओर इसकी भाषा जरूर अलग है लेकिन उद्देश्य आह एक ही है
इसका कोई धर्म नहीं धर्म बस यही की सच्चाई हो अच्छाई हो
दुनिया मे।
*nk सेवक “सनातन”