इतिहास ऐ घुँघटा !
इतिहास ऐ घूंघट
घूंघट को शालीनता ओर संस्कृति से जोड़ा
रूपांगना पद्मिनी का घूमर ओर घूंघट बवाल बना
घूंघट का इतिहास संस्कृति और लाज-शर्म नहीं
भारत मे लाज-शरम से इसकी ली दलील
नहीं नही ये नाजुक-क्रूर विषम समय की मांग थी
भारत मे जब स्वयंवर की प्रथा विद्यमान थी
किसी देवी किसी अशोक कालिदास कालीन
दुष्यंत पत्नी-प्रेयसी घूंघट का कहाँ
निशान रही
वो मुक्त स्वछंद संस्कृति सीता जी भी पर्याय रही
नहीं था घूंघट पट तब क्योकि संस्कृति प्रेरणा-प्राण थी
फिर प्राचीन से मध्यकाल आया
आक्रांताओं का चहू ओर जाल आतंक छाया
स्त्री शारिरिक उपभोग की संस्कृति माना
चेहरा ही बदन की शान जिससे आकर्षण आता
देख जिसे पुरुष लम्पट ,पगलाता बरगलाता
बेनियत वह अनैतिक आचरण दोहराता
ऐसे में चेहरा घूंघट में छुपाना विवशता
लेकिन जलवानशी क्या-क्या, किस-किस को छुपाए
आदमी की नीयत साफ़ नहीं तो लाख छुपाए
अंदर तक झांके उससे स्त्री कैसे
बचे -बचाये
अंततोगत्वा एक ओर दलील ऐ “सनातन”
अगर ये शर्म संस्कृति शालीनता की ही शान होती
स्त्री समाज उठ ख़िलाफ़ इसके क़भी बवाल न करती
कालजयी समाज सुधारक राममोहन और ओर
यू इसे कुरीति सामाजिक बतला
विरोध न करते
संविधान और शिक्षा इस गुलामी बुराई को
हां बुराई को कतई तरजीह नहीं नहीं देती
आज किसी भी स्त्री को पूछ लो
यदि थोपा न जाय
कितनी स्त्रियां घूँघट का पक्ष धरती और ओढ़ती
निचोड़ यही मंथन ऐ “सनातन” ये स्त्री समाज पर अन्याय का द्योतक
समाज इसे नकारे ओर स्त्री के घूँघट में नहीं
पुरुष समाज की आंखों में घूँघट अपनाएं
आधुनिक समय की यही पुकार शिक्षा का यही उपहार
चलो फिर हम प्राचीन उनमुक्त छवि संस्कृति अपनाए
*Nk सेवक “सनातन”