~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

उम्र अस्सी पार का तिराड़ी आईना

■उम्र अस्सी पार का आईना ■
खूब खाया बहुत पिया
अच्छा खाया सच्चा खाया
अच्छा पहना सच्चा पहना
अब दौर ऐ उम्र 80 पार
अब दलिया के खिचडी खाना कहो या अल्पाहार
पहनने को कपडे अपार
पर पहने कहां अवसर वो नहीं शुमार
पहनो चाह के तो फबता नही
अब शरीर कम ढांचा रह गया
खण्डहरी इमारतों का यही आईना है
जिंदगी एक दो चढ्डे या कहे बरमुड़े में गुजर रही
कभी कभी लोअर या ठेठ पायजामा
पहनो बड़ी राहत बुढापे का यही लिबास सच्चा
अधो वस्त्र में बनियान पहली पसन्द
या फिर एक दो ट्रीशर्ट ढीले ढाले
न जचे न फबे पर पहनने को पहने
दवाइयों का बाज़ार गर्म है
अपनी सेहत में ये नहीं सेतु से कम
घूमना यानी भ्रमण शौक नहीं मजबूरी हो गयी है
सुबह शाम परिजनों की जिद्द है
वो जीने के दिनो में मार रहे थे
अब मरने के दिनों में खूब जिलाये हैं
क्योकि सरकारी रिटायर्ड कर्मचारी हूँ
जितना जिलाओ तो ही फायदा है !
कमर ,घुटने जवाब दे गए हैं
दांत ओर आंत चर्मराये हैं
बैशाखी अब वो नही बेसाकि है अबसहारा सहारे वाली
आंखे जवाब दे गई है
बालो के नाम सब उजाड़ है
कुछ हैं आजु -बाजू तो श्वेत धूपिया बाल हैं
खाने-पीने, पहनने, घूमने के सारे साधन उपलब्ध
लेकिन दायरे कम हो गए हैं
काम के होकर भी बेकाम हो गए हैं ।
आईना कभी शौक़ था अब बोझ बन गया है
देखो तो खुद से ही सवाल है
दवा- दारू का जोर बढ़ गया है
खाने-पीने का अनिवार्य हिस्सा बन गया है
कुल मिला के मरने की उम्र में
जीने का शौक बढ़ गया है
जीने का हसीन दौर था तब मरे जिंदगी संवारने को लेकर
अब मर रहे तो जीने का शौक बढ़ गया है
अस्सी के पार अब उम्र कहे
पूछे कोई कितने बसंत
कहते भाई छूट गए हैं
जब से उम्र पचास के पार गए हैं
बसन्त कहाँ पतझड़ भी वो ठूठ वाला
कहने को जी रहे हैं
अर्थ से सुदृढ पर काया से क्षीण
यू कहें कि पल पल मर रहे हैं
लोग जिलाना चाहते हैं
लेकिन आलम ये है कि
अब दीपक में तेल कम
बुझ रहे हैं
अगर आधुनिक बल्ब से तुलना करें
तो बल्ब पुराना ज्यादा वाल्ट करंट आया कि
फ़्यूज
फिर क्या औपचारिक निस्तारण
ओर खेल खत्म
आधुनिकता की देन फ़ोटो है
जो टँग जायेगे
साल भर में दो दिन के सिवा
मिट्टी खाना और गले मे सुखी बेख़ुशबू माला
अट्टहास करेगी
की ताज़ा खुशबूदार फूलों की बात करता था
आज मुरझाए फूल भी नसीब नहीं
रोज रोज ताज़ा चढ़ाओ तो खर्चे का काम
फिर रोज चढ़ाने का झंझट
वैसे भी मैं वापस आना नही
आखिर जमाने का बेदर्द रिवाज
जाने वाले को कौन पूछता है
जबकि आने वाले
सिर्फ और सिर्फ जाने वालों से ही हैं
लेकिन यही आईना सांसारिक सफर का
क्यो किससे गीला
आपने भी तो यही किया था
हां तुझसे पहले तेरे जाने वाले !
*nk सनातन