# बस यूं ही पर नहीं… बस यूं ही नहीं…मन का क्षोभ थोड़ी सी दुनियावी ग्लानि#
महत्वकांक्षाओं का यूं पालना सांसारिक सत्य है
लेकिन जो है उसे सबके सामने नहीं जताना असुरी सुर याके प्रकृति ठीक नही
हमारी आपकी मंशा में हो साफगोई
कवि पद्य लेखक गद्य सजीव~निर्जीव का यहां बड़ा अंतर हैं
समझते हम भी समझते आप भी ही
लेकिन उत्तर दक्षिण की मनोवृत्ति ठीक नही है
जब मिलते है किसी से पहली बार~2
पहचानने में इक वक्त लगता है
और जब तक पहचाने
देर हो चुकी होती है
तब पीछे हटना या अलगाव अचूक लगता है
शादी ब्याह चाहे लव (गंधर्व विवाह) या के अरेंज मैरिज (सामाजिक समझोता या रस्मीय विवाह)
निभाना ही इक विकल्प हर हाल में
वरना जग हसाईं आम होती है
तलाक का तब इक ही सुलभ उपाय
लेकिन तब सांसारिक मानसिक उथल पुथल
जीवन की दूसरी पारी कहां आसान होती है !!!!
*NK सनातन