अब… फ़िज़ाओं !

अब… फ़िज़ाओं !

अब….!
अब फूलों पर मकरन्द नहीं मंडराते
क्योकि फ़िज़ा में अब वो बहार नही
फूलों में वो मधु धार नही
भौरों की गुंजन भी कही खो गयी हैं
क्योकि चारो तरफ विषैली हवा
ओर खिज़ा का तन्हा आलम हैं
अब फागों के लोक गीत है गायब
वो मृदंग-चंग ढोल मजीरों की झंकार नही है
न वो धूल भरी आंधियां है और धूल की गुबार दिखती है
फाल्गुन सिर्फ नाम का रह गया है
बसन्त सिर्फ आती है अहसास नही कराती
की वो आइ है ऋतुराज बन कर
अब ऋतु आती है राज नदारद है
कोयल की गुल-बुलबुल
का नधुर आलाप- तान गायब है
सावन आता है न बरखा बहार है
पपीहे की पुकार ओर मदमाता इठलाता नृत्य पुकार हवा हो गयी है
है तो चारो तरफ़ अतिवृष्टि ओला वृष्टि
कम्प भूकम्प सुनामी महामारी आपर्यावरण का तांडव
चारो तरफ अकुलाहट असंतुलन का दौर है
मानव प्रकुति पर विजय पाकर खुश हैं
लेकिन अब भी मजबूर असहाय विवश त्रासद
इसी की विधा से है
मानव आज भी तुच्छ है ”सनातन”
उस शक्ति के आगे
लेकिन चलो प्रयासातुर
मानव होसलो से नही पस्त है !
*nk सनातन”

[29/03, 10:04] Nk Sanatan: रंग हो या बदरंग जीवन तो जीना होता है
कभी दीवाली तो कभी होली
आईना सब त्योहारों का एक सा होता है !
*रंग दार होली
हुड़दंग धुलण्डी
मस्ती के रंग
शिव की भंग
बस सब कुछ
बम बबम बम
शिव लहरी
[29/03, 10:15] Nk Sanatan: रंग हो या बदरंग जीवन तो जीना होता है
कभी दीवाली तो कभी होली
आईना सब त्योहारों का एक सा होता है !
*रंग दार होली
हुड़दंग धुलण्डी
मस्ती के रंग
शिव की भंग
बस सब कुछ
बम बबम बम
शिव लहरी….!!!
*NK सेवक “सनातन”

[29/03, 10:37] Nk Sanatan: पिछली बार की तरह ही ये होली भी आई है ।
करो… ना दुवा सच्ची की
”कारोना” समूल मार
जाइ हो ।।
*NK सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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