उजाले मगर किसके ?

दिवाली किसकी?
पड़ सो रूप चौदस कल धन तेरस
आज दीवाली
मगर किसकी
आपकी मेरी उनकी
मगर शर्तिया सबकी नहीं
क्यो क्यो क्यो
रूप चौदस को मैंने देखे बहुत खूबसूरत लिबास में सजे कुछ लोग
लेकिन दूसरी तरफ कुछ मैले गंदले लोग
चेहरे से कद काठी से सजीले
लेकिन रूप निखरता है
नूतन पोशाक निखारती है तन- बदन को
ओर वो बेचारे फटेहाल
दूसरे रॉज चारो तरफ उमड़ा चमक दमक से लदा लकदक
रोनके बहार
यानी धन की बरसात
यानी खूब खरीददारी
ओर चहु तरफ लक्ष्मी पूजन
जिनके पास है उनके द्वारा
नहीं है उनकी गुहार
मातारानी के देवालयों में
समृद्ध होने की धनवान होंने की
ओर आज दिवाली
लेकिन किसकी ???
आज भी मैने देखे है
हां मजदूरों को मजदूरी करते हुवे
पसीना बहाते हुवे
निश्चित उनके लिए दीवाली नहीं है
खाने में सिर्फ़ उबली दाल
उबली सब्जी सुखी रोटी
ना तेल ना घी
वही कंडे उपले घास फूस का ईंधन
वो रोज़ जलते हैं तन से मन से
वो तेल घी के दिपक जलाए तो कैसे
बा मुश्किल जिनजे दो जून की रोटी नसिब
अफसोस दीवाली उनकी नही है
सवाल ये की उनकी दीवाली हो
लेकिन कैसे
सरकार सोचे
क्योकि सारे देश की दिवाली मने
ये देश की सरकार
या फिर देश के बड़े
कारपोरेट जगत के ही बस की बात
हम् तुम वो सिर्फ़ आह भर सकते हैं
टूट के मारे क्षोभ के
कह सकते हैं
कह सकते हैं बस
लेकिन कहना वो भी
एक उद्देश्य उद्धार का ही अंग
क्योकि उद्गार से ही क्रांतियां आयी है
ओर आबो हवा में थोड़ी बहुत बहार है
समझो जानो उसी से छाई है-2
सर्वहारा वर्ग की उन्नति उन महान विचारको लेखकों कवियों मनीषियों से ही आयी है
*nk सनातन