Dr. कुमार बड़े विश्वास से सबकी उड़ाते हैं थोड़ी उनकी भी उड़ाई जाए
◆कुमार सबकी उड़ाते हैं ,
चलो थोड़ी उनकी भी उड़ाई जाए ! ◆
[ Dr कुमार साब के फेमस फ़िकरे–
आज जो कुछ मैं हूं आपकी बदौलत ओर आज जो कुछ हैं मेरी बदौलत( मोदी जी ,आडवाणी जी ,मुरलीमनोहर जी के संदर्भ में )
एक वो जो बोलता ही नही था ओर एक ये हैं कि रुकता ही नही
सुना है अटल जी कर घुटने खराब जो गए भई जब उपयोग ही नही हुवा तो खराब कैसे हुवे… ठहाके…..
[ ◆ऑन लाइन कवि सम्मेलन ओर आयोजको को लिफाफे ! ◆ ]
एक कवि दूसरे अकवि मित्र से फुनवा पर–
यार कैसे हैं ?
यार क्या बताये लोक डाउन ने सब धंधा चौपट कर दिया !
*कैसे यार तुम तो कवि हो , व्यापारी थोड़े न हो !
*अरे भाई अब कवि कह के लजाओ मत , हमार तो रोजी-रोटी ही कविता से चलत रही सो …ओर फिर
इधर-उधर जुगाड़ जमा साल में 20-30 कवि सम्मेलन उठा लेते थे !
उठा लेते थे !!
हां अब इसे बुलावा तो कह नही सकते न , हथियाना कह लो यार… क्योकि जुगाड़ में सूत्रधार को कमीशन देना होता है फिर आयोजन समिति के कुछ अधिकारियों को हिस्सा सूत्रधारो को देना होता हैं न यानी कहने को तो 20 हज़ार रेट हाथ मे आते थे 2 हज़ार लेकिन अपने बाप का लगा होता कि जाता है जो भी मिला मिलता तो ह न…ओर फिर
क्या करे तालियों से थोड़ा बहुत पेट भर जाता है और घर मे दाल रोटी मिल जाती है और फिर कवि हैं तो शहर ,इलाके में साख अच्छी है लोन वगेरह कम ब्याज के मिल जाता है !
*हां यार लेकिन लोक डाउन में तो मझे हैं….
कैसे ?????
की ऑन लाइन कवि सम्मेलन धड़ल्ले से चल रहे है !
तो क्या फालतू हैं ये ….
क्यो जी..
अरे भई इसमे कुछ मिलता थोड़े ही है … बस गाल पे झापट मार कर खुश हो लो बस
क्यो ? क्यो क्या ? यार ग्रुप में या संस्था में 500 मेंबर
ओर जुड़ते हैं फेसबूक लाइव 5
यार रोना आ रहा है ..क्यो यार ये फसबूक है हर कोई लिंक भेज रिया है और जुड़ने की गुजारिश कर रहा है….
अरे नही यार कवि हो सब्र करो ।
*Lock Down खुलने के 6 माह बाद
केसेन है कवि मित्र
अरे यार कविता ओर कवि सम्मेलनों पर आश्रित थे
सोशल डिस्टेंसीग जहां तन से जितना जिंदा रखे हुवे है इतना मार भी रखे हैं
क्यो ???????
क्योकि डर के मारे आदमी मनोरंजन की रिस्क नही ले रहा है…
कवि सम्मेलनों के आयोजन बन्द हो गए…
बस यूट्यूब पर उपलब्ध कवि सम्मेलनों की विडियो से ही लोग-आयोजक मनोरंजन कर रहे हैं….
लेकिन ऑनलाइन कवि सम्मेलन तो चल रहे हैं !
अरे भई वो तो उनके लिए हैं जिन्हें कोई अवसर नही मीलते हैं
अब बेचारो को क्या पता इसमे भी ब्यूरोक्रेसी या लालफीताशाही का गुप्त चलन है स्याह राजनीति की तरह ; सीधा है एक छोटे अफ़सर से मंत्री जी तक हफ्ते महीने बंधे हुवे हैं गुप्-चुप, गुप्- चुप..
*तो ये ऑन लाइन कवि सम्मेलन..
अरे ये जो नोसिखिये हैं न जो मचलते है सुनाने को उनके लिए है
ओह चलो अच्छा है बेचारो को अवसर तो मिलता है !
खाक अवसर मिलता है ये इण्डियन आइडियल ओर डांस इंडिया डांस या कोंन बनेगा करोड़पति की तरह है जहां कुछ पाने के लिए कुछ देना पड़ता है
मतलब…..!
भई मतलब साफ है ऑनलाइन कवि सम्मेलनो के आयोजक FB पर लाइव आने के किये लिफाफा लेते हैं
क्या लिफाफा भई वो क्यो
अरे भाई आपको अवसर, पहचान ,समय दे रहे हैं और न सहते हुवे भी सह रहे हैं!
ओह ऐसा क्या !!!!!
फिर 6 माह बाद
ओह छुट्टन जी कवि महोदय केसेन बा
अरे क्या बा सब बा बा…
यानी…..
यानी फकीर, मलंग ,फाकामस्ती ओर क्या !
क्यो यार ….????
यार इसलिए कि कवि सम्मेलन वापस होने लगे हैं
हमने रेट बढ़ा दी…..
यार रेट तो वेश्याओं की होती है…
अरे यार जो भी समझो अब विराट कोहली जैसे सरे आम नीलाम होते हैं , बिकते हैं तो अपना क्या अपन कवि है पर उससे पहले तन है पेट है अपने साथ….
कोई प्रत्यक्ष बिक रहै है कोई परोक्ष ..
इस कड़ी में तुमने दिलीप कुमार साब पर फिल्माया मशहूर गीत जो रफी साब ने गाया है सुना है ..मुझे दुनिया वालो…
यानी हमाम में सब नंगे हैं
अरे भाई मनुष्य हैं सब बदबू गाहे बगाहे छोड़ते ही हैं और सभ्य भाषा मे शौच तो सब जाते ही हैं न….इस मामले में सारी प्रेस्टिज बराबर…ओर सरल करे तो धन्यवाद ईश्वर की इस विषय मे सबकी औकात इक रखी है वरना ये अमीर, सेलेब्रिटीज़ ,कॉरपोरेट …जाने क्या समझते आम जनो को…
हाँ कविवर ये बात तो है…
तो आप क्या कह रहे थे…
वो ये की हमने रेट बढ़ा दी
कितनी …
मात्र 16 लाख
16 लाख…!!!!!!
हाँ वो अपना कुमार है न विश्वास के नाम दीवाना बना के 15 लाख लेता है….
मतलब….
मतलब वही की वोही थोड़ी इधर- उधर की पेल पेला के घण्टे भर के 15 लाख ले जाता है….
बेचारा कोई नई रचना सुनाना भी चाहे तो श्रोता कम दर्शक दीर्घा जिद्द करती है कि वो ही सुनाओ
कोई दीवाना कहता है..
वो बेचारा खुद कहता है कवि सम्मेलन में की वोही सुननी थी तो यूट्यूब पर सुन लेते आयोजको को 15 लाख का चूना क्यो लगवाया……. फिर भी कुछ नई सुना देता हूं नही तो कल अखबारनवीस लिखेगे..
क्या…????
की वो र लिखेंगे हैडलाइन शीर्षक में की कुमार वही पुरानी पेल 15 लाख ले गये ….
ओर देखिए अरविंद केजरीवाल और उनकी आप से जुड़कर कुमार के प्रति आयोजको ओर श्रोताओं का विश्वास बढ़ा और उस विश्वास का डॉक्टर साब ने बिना इलाज के ही खूब फायदा उठाया ; राजनीति वाकई ऊंची चीज है , व्यक्ति को फ़र्श से उठा के अर्श पर रख देता है …. अब देखो चायवाले भी लोकतंत्र के राजा बन गए… एक वो भिश्ती एक दिन के लिए बना सम्राट दिल्ली का ये 10 साल…आई मीन…
कुमार साब ने देखते ही देखते एक लाख से 5 लाख , 5 लाख से 15 लाख पातेय बढ़ा लिया लेकिन चलो इस बात से उन्हें तो फायदा हुवा ही लेकिन देश को भी फायदा हुवा…
वो कैसे…..????
वो ऐसे की वो देश के पहले टेक्स पे कवि बन गए….
ओर उनके पी ऐ सी ऐ भी हैं और कुछ सेवाकर्मी भी जो पूरा तंत्र-मंत्र देखते हैं….
उनको आयोजको द्वारा प्रदत काला-सफेद धन ….देश कोष में जाकर नेताओ….गरीबो के काम तो आता है और आया है…..
अच्छा, अच्छा सही पकड़े हैं,
सही पकड़े हैं …क्या ,?????
अरे कुछ नहीँ …भाभीजी घर पर हैं याद आ गया…..
किसकी .. यार तुम्हारी नही…
अरे किसके क्या वो अंगुरी जी हैं न स्वीट, मीठी, करारी , छुई-मुई…
कौन करारी मीठी स्वीट यार समझे नहीं…
अरे वो विभूति नारायण मिश्रा जी हैं न वो अपनी करारी अनिता को छोड़ अंगुरी जी ओर तिवाड़ी भैया अनिता जी के पिछलग्गू क्या दीवाने हैं दीवाने….
हाँ यार दूसरे की थाली में ज्यादा घी नज़र आता है…
यानी घर की मुर्गी दाल बराबर… सही कहा है किसी ने…
तो कवि महोदय बहुत कुछ पेल लिया आप ने भी इधर -उधर का
सुनाओ ओर क्या हाल है ???
बस यही की रेट 16 लाख कर दी है तो कोई बुला नहीँ रहा..…!
क्योकि वही काम अपने डॉक्टर कुमार सिर्फ 15 में करते हैं और अपने से ज्यादा अच्छे से करते हैं…
ओह ये तो जुल्म हो गया..
तो यू करो न कि रेट कुमार साब से कम कर दो…
नही ,नही भाई…
शेर भूखो मर जाई पर घास नाही खाई….
ओर फिर हम बॉलीवुड स्टाइलिश अभिनेता डायलॉग किंग राजकुमार साब के प्रशंसक हैं– एक रुपया ही सही पर सारे स्टार से ज्यादा ही लेते थे…
तो क्या आप …उनकी छोड़ो
कम कर दो दर….
नही ,नही जानी….
हम कोई राजनेता नही जो थूक कर चाट जाय !!!
पानी पी के ही डकार मारेंगे…
लेकिन उसूलों से समजोता हरगिज़ नही करेंगे….
आखिर कवि हैं कोई भांड थोड़े हैं …क्योकि साहित्य है तभी तो भांड हैं हम लिखते हैं वो अभिनय करते हैं पार्श्वगायक गाते हैं…
लेकिन देखो न भांड अरबपति बन गए और गीतकार बेचारे….
छोड़ो यार…..
लेकिन फिर ऐसे कैसे काम चलेगा
परिवार का क्या होगा…
अरे वैसे तो हम कुछ अखबार के संपादक महोदयो से सांठ-गांठ कुछ साहित्य अकादमी के आकाओ कर्ता धर्ताओ से जुगाड़ जमाये हुवे हैं ….कमीशन बेस पर तो थोड़ा उन्हें थोड़ा हमे मिल जाता है… उनके कोठिया बन जाती है हमारे पेट पल जाते हैं..
वा… चलो एक संपादक साब का फोन आ रहा है लगता है कुछ छपाने मांग रहे होंगे… क्यो की रिश्ते व्यावसायिक हैं उनकी हमसे हमारी उनसे कमाई हो जाती है तो फोन आते ही है.. अच्छा है आप लिखते भी अच्छा है तो फोन तो आएंगे ही….
नहीं ,नही छपने के लिए अच्छा लेखन कविता जरूरी नही बस जुगाड़ अच्छा होना चाहिए…
*NK सेवक “सनातन”