मैं क़ातिल तो नहीं मगर ऐ हँसी!

*मैं तेरी तरह क़ातिल तो नहीं!
तूने कहा की चाहे तू मेरी जान ले लें पर ये मत कह की मुझसे इश्क नहीं
तो मजनु सुन – मैं तेरी तरह कातिल ऐ यार या खूनी नहीं
ये साफ है की तू मेरी पसंद नही
ये अलग बात है की मैं तेरी पसंद हु
ओर तुझे मुझे चाहने का प्राकुतिक – भौतिक हक है
ओर तेरी चाहत की मैं कद्र करती हूं
लेकिन अफसोस मुआफ़ करना
तू मेरी पसंद नही
ओर मुझे भी प्राकुतिक-भौतिक चाह ओर नापसंद का हक है।
*रदीफ ओर काफ़िया में उलझा तो तेरी खूबसूरती बया न हो सकी
क्योकि वो अलफ़ाज़ ही नही मिले जिससे बयां मैं कर सकू तुम्हे पूरा ओ मेरे शबाब-दिलनशी
*न रदीफ में समाई तुम ओर तुम्हारी खूबसूरती ।
ना किसी काफ़िया में सजा सका तुम्है ओ मैं मेरी रूपबसन्ती।।
*दुनिया मे उपलब्ध सारे शब्द-रूपक , अलंकार, छंद, अलफ़ाज़, काफ़िये, रदीफ से नवाजा लेकिन सब फीके रहे तेरी खूबसूरती से ओ मैरी रूपांगना
तब मैंने कहा तुम स्वर्ग की सारी अप्सराओं सी खूबसूरत और देवियों से सौम्य-शीलवंती हो।
*NK सेवक “सनातन”