~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

Quill pen, inkwell and open manuscript pages

NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

शराब पीता हूँ शुक्र ख़ुदा की किसी का लहू नहीं पीता!

अजी मैं तो शराब पीता हु
शुक्र मानो सिर्फ शराब पीता हु
किसी के बाप की नहीं अपनी कमाई की पिता हु
अजी मैं सिर्फ़ शराब पीता हु
कुछ लोग तो लहू पीते हैं
वो भी सरे बाज़ार पीते हैं
मैं तो बेठ के घर मे ही पीता हु
पीके उन जालिमो ने खून मजलुमो मजबूरों का
खटमल सी ओकात पाई है
पीके शराब मैने सच्चाई कमाई है
शराब यू ही नही बनती
कितना जलन पड़ता है शुद्धता के पैमाने
तब कहि जाकर हाला ये पीयूष सा काम करती है
न पीने वाले कोसे इसको
पीने वाले फ़क्र करते इसे खुदाई उपहार कहते हैं
हर शादी पार्टी की शान यू ही नही
हलफ में उतर के ये आईना साफ करती है
बेवजह बदनाम कर रखी है मुझ शराब को
महिसासुर को मारने माँ जगदम्बे भी सुरा पान करती है
सूरा नाम यू ही नहीं पड़ा इसका ओ नादानी ना समझो
सुर रॉज देवेंद्र के धाम ये पेय राह बनी है
अप्सराओं के हाथ परोसी जाती सोने के कलश
तभी ये धरती के वासियों की नाज़ बनी है
एक बार पी के देख साक़ी के हाथ
तू जो किनारा करता
सनातन का दावा तू भी इसका कद्रदान हो जाएगा सदा के लिए
शराब और शबाब ही इस जहाँ की दौलत
दो में एक तो हर कोई पिये
जिसे माना समाज ने अनैतिक
बांध धर्म मे नैतिक बनाया
हमाम में सब नङ्गे उघाड़े
फिर तुम क्यों शराब से कतराते
बस इतना जान शबाब सी नही ये कातिल
सच्चाई के लिए ये हद से गुजर जाए
बस इतना जान ओर जान खुदाई सूफियाना ये जान अपना