शिव शिवामय सावन आध्यात्मिक फुहार
“जब उठता हूँ ,उठ जाता हूँ विरक्त जहाँन की सेर रिक्तता भरने को **
[ “सावन की रिमझिम फुहार
श्रावण शिव आराधन ज्वार
व्रत वास उपवास निर्झल-बिन आहार
शिवमय ये पावन माघ दैविक व्यवहार !”]
जब उठता हूं
तेरा स्मरण तेरा ही मनन
तेरा अर्चन तेरा
तेरा वंदन
तू ही केसर तू ही चंदन
तू ही अबीर तू ही गुलाल
तू भभूत का आइना
मिट्टी ये संसार
ओ प्रिय भंजन
मेरे हृदय के मंथन
मेरा सुकून मेरा अनुरंजन
मेरे मगर हकीजत तेरे घर
जो दीवार पर
आसमानी कद त वृहद मोहक तेजोमय तस्वीर सजी है
मेरा विश्वास मेरा सम्बल
मेरे मन मंदिर में कैलाश सजी है
कैलाश रमी है
की जब- जब मैं निहारता हूँ
तेरी पावन आभा में रम जाता हूँ
पाता हूँ मन आंगन में बारह महा ज्योतिर्लिंगम धाम-ही-धाम
हो साक्षात तेरे दर्शन तेरे उन महा धाम
लेकिन तेरी इस मूरत में तेरी इस मोहिनी सूरत में
मेरे घर मे ही पाता हूँ
बारह ज्योतिर्लिंगम धाम
आदि गुरु शंकराचार्य
स्थापित एकता सौंदर्य आध्यात्म के चार महा धाम
जिनमे तीन तेरे सखावर तेरे प्रिय मित्रम मित्र विष्णु तीन धाम
एक शैव महा रामेश्वरम श्रीराम आराधन मंगल विजय धामम धाम
हिन्दू सागर जिसके पाव पखारता
असनानी ज्वार हिलौरो मे मन फुहारता
की तू ही मेरा कैलाश धाम
तू ही बाबा बर्फानी अमरनाथ
तू पहाड़ी छटाओ में,उपत्यकाओं में,कंदराओं में
बसा केदार नाथ
इस तस्वीर में ही महा त्र्यंबकेश्वर महाकाल
तू ही नर्मदा तट पर बसा ओंकारेश्वर
तु घृनेश्वर धाम
तू ही बेजनाथ ट्यू ही भिमाशंजर
तू ही नागेश्वर
और तु ही अरब सागर की लहरों का तांडव सरताज सब के सोम और नाथ-सोमनाथ
तू ही महापावन गंगा किनारे बोलता डोलता झूमता काशी नटराज
हांमहागौरी का प्रिय प्राण हमारा
श्रद्धा विश्वास का विश्वनाथ !
उधर सुदूर पूरब की शान मल्लिकार्जुन शिव ज्योतिर्लिंगम धाम
फिर दक्षिण की दिलकश झलक हिलोरे मारता महा समन्दर सिंध हिन्द महासागर श्री राम के आराध्य आराधन
ओ सुरमयी कृपा सिंधु महारामेश्वर सुर धाम
और तू ही तू पूरा ब्रह्मांड समेटता नेह नेपाल जय पशुपतिनाथ !
पाशुपतास्त्र जैसा अमोघ विरल शस्त्र
हिमालय का चरम दिव्य ब्रह्मांड भी कांपता
की न खुले तेरा त्रि नेत्र
और करें तु क्रोध रोष दावानल तांडव
क्या खूब रमता जोग जोगेश्वए अपना भोलेनाथ
आदि नहीं अंत नहीं
अजन्मा तू अनंत मे समाया
भोलेपन में संसार रामाया
और जीवन का असल आइना
महामृत्युंजय तूने है शिव आशुतोष
तूने अंत मे मौत और मोक्ष रथ का चीर सजाया !!
भारत गूंजता जीवन रक्त में
और छूटता काल विरक्त में
सर्वत्र पंचगक्षरी महा मंत्री धुन –
ॐ नमः शिवाय-5
ॐ त्र्यम्बंक यज़ा मही सुगंधिम पुष्टिवर्धनम
उर्वारुकमिव वंधनांन मृत्योर्मुक्षीय मामृ ताम
ॐ नमः पार्वते शिवाय नमः!!
बस तू पयोधर सिखाता कि
विष भी जाओ जहाँ ज़रूरत
पचा जाओ फिर देखो हो जाएगा सब मंगल
घड़ी वो विषैली टल जाएगी
हो जाएगा सब अमृतमयी !!
*NK सनातन